चलो चलो चलो चलो चलो 27 जून को अपने वीर शहीद पुरखों की शहादत के पवित्र स्थान को नमन करने सती चौराहा घाट कानपुर चलो

मुजफ्फरनगर, एकलव्य मानव संदेश रिपोर्टर, 23 जून 2017। 
       अपने पूर्खो का इतिहास जरूर पढ़ें ।
27जून1857_सतीचौरा_घाट,कानपुर की घटना.....
लोकतंत्र की स्थापना हेतु समाधान निषाद, लोचन निषाद आदि नाविकों ने हजारों अंग्रेजों को कानपुर के सत्तीचैरा घाट पर गंगा नदी में डुबोकर मारा था। परिणामस्वरुप अंग्रेजों ने क्रूरता का अंजाम देते हुए फांसी, गांव जलाकर एवं उजाड़कर 27 जून 1857 को 167 निषादों को सुबह 7 बजे पीपल के पेड़ में टांगकर कच्ची फांसी दी। कानपुर के बिठूर सैनिक छावनी से हजारों अंग्रेजों एवम देष का धन सैकड़ों नावों में लेकर समाधान व लोचन निषाद की अगुवाई में गंगा नदी के रास्ते कलकत्ता जा रहे थे। रास्ते में महाराज गुह्यराज निषाद के इलाहाबाद के पहले प्राचीन नगरी श्रृंगवेरपुर में नदी के किनारे टीले पर रात्रि विश्राम के लिए जहाजी बेड़े सहित रूके। अंग्रेज नावों पर विलासिता में लिप्त थे। सभी नाविक भोजन पानी के लिए टीले पर स्थित निषाद बस्ती में आ गए। 
नाविको ने गाँव के लोगो से पूछा-
  अरे भाई ये इतना ऊंचा टिला किसका है ? 
इतना सूनते ही गांव के लोगो ने कहा अरे चूप ये टिला नही तुम्हें पूरखो का किला है जिस अंग्रेज की तू गुलामी कर रहा है वह अंग्रेज हम लोगों को गुलाम बना कर रखे हैं तथा बहू-बेटियों की इज्जत लूट रहे हैं आप लोग इनकी सेवा में लगे हो। 
      
       आज तो आप लोगों को विरादरी के नाम पर दाना-पानी मिल जा रहा है लेकिन इसके बाद आपको अपमानित होना पड़ेगा। यह देश हम निषादों का है, इन गद्दारों का नहीं। जिनकी आप सेवा कर रहे हो। जिस टीले पर बैठे हो यह तुम्हारे वंश के महाराजा गुह्यराज निषाद के किले का ध्वंसावशेष है।
समाधान एवं लोचन निषाद आश्चर्य भरी निगाहों से देखने व सोचने लगे कि हमारे वंश में भी राजा थे सभी नाविकों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। सभी नाविकों ने वही प्रण कर लिया कि अब इन विदेशी गद्दारों को खत्म करना है और खोया हुआ राज विरासत वापस लाना है। यहीं से वापस चलकर इन गद्दारों को अब कोलकाता नहीं पहुंचाना है। नाविकों ने अंग्रेजों से कहा कि आगे गंगा नदी में पानी कम है नाव आगे नहीं जा पाएगी। निर्णयानुसार सभी जहाजी बेड़ा बिठूर वापस आ गया। सभी नाविक समाधान एवं लोचन निषाद के नेतृत्व में हजारों अंग्रेजों को एक साथ डुबोकर खत्म करने का वादा कर संकल्प लिया और योजना बनाई कि जब गंगा में बाढ़ आएगी तब कानपुर में अपने गांव के सामने इन विदेशी गद्दारों को डुबोकर मारा जाएगा। समाधान व लोचन निषाद ने सभी नाविकों से कहा कि जब हम पघारा (पगड़ी) हिलाएंगे तभी आप सभी नाविक नाव के अंदर जाएंगे। जहां पहले से आप सभी के नावों में कुल्हाड़ी रखी होगी जिसे उठा कर नावों की पेंदे पर तेजी से कुल्हाड़ी मारकर तोड़ देना है। जिससे नाव फट जाएगी, अंग्रेज डूब कर मर जाएंगे तब आप लोग तैरकर बाहर निकल जाएंगे। जब बरसात के समय में गंगा नदी में बाढ़ आई उसी समय बिठूर छावनी से हजारों अंग्रेजी सैनिकों का जहाजी बेड़ा लेकर जब कानपुर सत्ती चैरा घाट के सामने आए तो समाधान निषाद ने अपना पघारा (पगड़ी) हिलाया। सभी नाविक एक साथ नाव में नीचे जाकर जोर से टांगा मारा जिससे नाव फट गई। सारे अंग्रेज सैनिक मारे गए। सभी नाविक तैर कर भाग गए। उनमें से केवल एक अंग्रेजी कमांडर डा.एंड्रयूज ब्लैक स्मिथ और साथ में एक सैनिक किसी तरह बच गए।
इस घटना का विस्तृत विवरण डा. स्मिथ ने अपने पत्र में ब्रिटिश सरकार को लिखा कि ये निषाद बहुत सेवा करते थे लेकिन इनका आत्म सम्मान जाग गया है। अब पूरे देश में जगह-जगह हमारे सैनिकों को मार रहे हैं। आज हजारों सैनिकों को डुबोकर मार दिया गया है। तब ब्रिटिश सरकार ने इतिहासकारों से सर्वेक्षण कराया तो पाया कि निषाद भारत के आदिवासी मूलवासी है। भारत देश तो निषादों का है। ये लोग शकों, यवनों,हुणों,आर्यों एवम मुगलों से लड़े, आज हम अंग्रेजों से भी लड़ रहे हैं। यदि भारत में शासन करना है तो कानून बनाकर इन निषादों को मौलिक अधिकारों से वंचित करना होगा। कानपुर की घटना के बाद सन 1860 ईसवी में सी आर पी सी एक्ट (भारतीय दंड संहिता 1860) कानून बनाकर निषादों को कानपुर के सत्ती चैरा घाट पर 167 लोगों को पीपल के पेड़ में टांगकर कच्ची फांसी दे दी गई और उस गांव को जला दिया गया। इसके कुछ ही दिनों बाद समाधान निषाद व लोचन निषाद को भी पकड़कर फांसी दे दी गई, जो देश के लिए शहीद हो गए। 12 अक्टूबर 1871 को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू कर जातिगत आधार पर अपराधी जनजाति घोषित कर अधिकारों से वंचित कर दिया। जीवकोपार्जन के संसाधन नदी, ताल, घाट व वन को नार्दन इंडिया फेरिज, फिसरिज, फारेस्ट, माइनिंग एक्ट 1878 लागू कर संपत्ति से बेदखल कर निषाद को आदिवासी जीवन जीने को मजबूर कर दिया। जिससे निषाद अनेक उपजातियों में बट गए। जैसे मझवार, तुरैहा, गौड़ (निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप, मांझी, बिन्द, रैकवार, कहार, धीमर, धिवर, बाथम, गोड़िया) शिल्पकार (कुम्हार, बढ़ई, लोहार, भट्ट, दर्जी, जुलाहा, तेली, नाई, बारी) खरवार, बेलदार, खरोट, कोल, धनगर, कोरी, मुसहर, नट, सैनी, भर, राजभर आदि।
उपरोक्त जातियों को बर्बाद करने के लिए लंदन की संसद में मिस्टर स्टीफन ने कहा था कि डाक्टर के यहां डाक्टर, वकील के यहां वकील, चोर के यहां चोर, गुनाहगार के यहां गुनाहगार और डाकू के यहां डाकू पैदा होता है। 1871 से लेकर 31 अगस्त 1952 तक 82 साल के लंबे अरसे से काला कानून की मार से उपरोक्त जातियां अंग्रेजों के जुल्म के शिकार हुए। जिला स्तर पर आपराधिक जातियों के लिए एक दफ्तर होता था जहां से इन जातियों के लोगों को एक पास मिलता था। वह जिस गांव में जाते थे, उस गांव के मुखिया को बताना पड़ता था कि मैं 2 दिन के लिए आपके गांव में आया हूं, जाने पर अपने गांव के मुखिया को भी बताना पड़ता था कि मैं आ गया हूं। पुलिस थानों में हाजिरी लगती थी। सुपरिटेंडेंट आफ पुलिस एक बार इन्हें सजा सुना देता था तो वही आखिरी फैसला माना जाता था। 1924 में इस कानून के तहत 12 साल का बच्चा भी गिरफ्त में आ गया, उसके माथे पर एक गर्म सिक्के से दागा जाता था ताकि पहचान हो सके कि ये अपराधी जाति का है। 1947 में देश आजाद हो जाने के बाद भी यह लोग 5 साल 16 दिन गुलाम रहे। पहला चुनाव इनके पुरखों को जेल में बंद कर कराया गया। 1949-50 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट इंक्वायरी कमेटी ने सरकार को रिपोर्ट दिया कि 193 जातियां आज भी गुलाम हैं। 31 अगस्त 1952 को संसद में अन्थ्रासैमन अयंगार क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट इंक्वायरी कमेटी ने जब प्रभावित जातियों से कानून हटा लिया तब जाकर इन जातियों को आजादी मिली। उसी दिन से मछुआरा जातियों को विमुक्त जनजाति की संज्ञा दी गई। जिसे सभी क्षेत्रों में 10 प्रतिषत अनुसूचित जनजाति के आरक्षण की संस्तुति  उत्तर प्रदेश में की गयी। मझवार, बेलदार, खरवार, गौड़, तुरैहा, दिल्ली में मल्लाह, बंगाल में केवट, बिंद, उड़ीसा में कैवर्त, केउट आदि विसंगतियों के साथ अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग में डाल दिया।
समाज के उत्थान के लिए सरकार ने कई कमीशन बनाए। 
(1) ए. साइमन अयंगार कमेटी 1949-50 
(2) काका कालेलकर कमेटी 1953-54 
(3) डाक्टर बी.डी.एन. मेहता आयोग 1963 
(4) लाकूर कमेटी 1965 
(5) बी.पी. मंडल आयोग 1978 
(6) राष्ट्रीय विमुक्ति एवं अर्ध घुमंतू जनजाति आयोग (रेणके आयोग) 2006 में बनाया था। जिसका नाम डी.एन.टी आयोग था। जिसके चेयरमैन बालकृष्ण रेणके थे। रेणके कमीशन की रिपोर्ट 78 बिंदुओं के साथ अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के लिए 2008 में सरकारों को भेजी है। जिसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रा व उड़ीसा सरकार ने लागू कर दिया है। परंतु 70 साल बीतने पर भी केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार ने लागू नहीं किया। हमारी मांग है कि रेणके आयोग की संस्तुतियों को केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार लागू करे। निषाद मछुआ समुदाय की मछुआ जाति की सभी प्रयावाची (केवट, मल्लाह, माझी आदि) को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में शासनादेश 229/2016/436 मंत्री/26.03.2016.3(1)/2016 टी.सी. समाज कल्याण अनुभाग-3 दिनांक 21. 12.2016 पात्र मझवार को प्रमाण पत्र देने का निर्देश जारी है। मैनुअल के अपेंडिक्स (एफ) के अंतर्गत अंकित अनुसूचित जातियों की सूची में क्रमांक 51 के सामने मझवार- मांझी, मुजाबिर, राजगोड, मल्लाह, केवट को मझवार का पर्यायवाची एवं जेनेरिक (वंशज) के रूप में मझवार अंकित एवं परिभाषित है। मझवार को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी होना चाहिए। इसी तरह क्रमांक 63 पर अंकित शिल्पकार की प्रर्यायवाची जातियों कुम्हार, बढ़ई, लोहार, दर्जी, जुलाहा तेली, नाई, बारी को शिल्पकार का, क्रमांक 64 पर अंकित तुरैहा की पर्यायवाची जातियों धीवर, धीमर, गोड़िया, कहार को तुरैहा का, क्रमांक 66 पर गोंड की पर्यायवाची जातियां धुरिया, नायक, ओझा, पठारी को गोंड का अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी होना चाहिए।
मित्रों जानकारी हर युग का हथियार होता है। हमारे समाज में ज्यादातर लोगों को जानकारी ही नहीं है। अगर जानकारी है तो समझदारी नहीं है, अगर समझदार भी हो गया है तो लोगों को समझदार नहीं बनाता है। समाज के गुलामी एवं गरीबी का कारण भी यही है। ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, संवैधानिक, धार्मिक, वैचारिक कैडर कैंप में नियमित आकर जानकार, समझदार, होशियार बन कर आने वाली पीढ़ी के बेहतर भविष्य का निर्माण करने के लिए 27 जून 2017 को सती चैरा घाट कानपुर में अपने साथियों सहित अवश्य पहुंचे।
निवेदक
इंजी. देवेंद्र कश्यप
प्रान्तीय अध्यक्ष
निषाद पार्टी
एकलव्य प्रान्त।

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