पत्थर की मूर्ति में प्राण डाल सकते हो !! मृत इंसान में क्यों नहीं?

मेरठ, एकलव्य मानव सन्देश रिपोर्टर, 25 जुलाई 2017, इंजी. पी पी श्रीवर जी का एक लेख।
एक बार एक गांव में मंदिर का काम चल रहा था, मंदिर आदिवासी और गरीब लोग बना रहे थे, एक आदिवासी बड़ी मूर्ति बना रहा था! कुछ दिन बाद मंदिर बनकर तैयार हो गया, मंदिर में पुजारियो द्वारा हवन कार्य मूर्ति स्थापना और मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा आदि कार्य सम्पन्न हो गया, अगले दिन मन्दिर दर्शन के लिए खोल दिया । बह मूर्तिकार जिसने मूर्ति बनाई वो भी दर्शन को आया था । बह ख़ुसी के मारे बिना चप्पल उतारे मन्दिर में प्रवेश कर गया ।
पुजारी उस पर क्रोधित हुआ और कहा -'मुर्ख तू जाहिल है क्या चप्पल पहनकर मन्दिर में नही आते जा चप्पल बहार उतार के आ '!
आदिवासी बोला -' पुजारी जी जब में चप्पल पहनकर मूर्ति बना रहा था और चप्पलों से उस पर चढ़ जाता था तब किसी ने मना नही किया :'!
पुजारी बोला -" बेबकूफ हमने अपने मन्त्रो से मूर्ति में प्राण डाल दिए है समझ गया ", बेचारा आदिवासी चुपचाप अपने घर चला गया, कुछ दिन बाद बह दोवारा मन्दिर गया तो देखा की मन्दिर में ताला लगा था, उसको किसी ने बताया की पुजारी जी का बेटा खत्म हो गया है। यह सुनकर वह दौड़ कर पुजारी के घर गया । वहा देखा सब लोग रो रहे थे । बह धीरे से पुजारी के पास जाकर बोला की आप रो क्यों रहे है, जैसे अपने मूर्ति में अपने मन्त्रो से प्राण डाल दिए वेसे ही अपने बेटे में प्राण डाल दीजिए, यह सुनकर सब अचंभे से उसकी तरफ देखने लगे । पुजारी बोला -'क्या ऐसा कभी होता है कोई मरा हुआ दुबारा जीवित होता है
आदिवासी बोला-' तो आपने मन्दिर में जो बात बोली क्या वो झूठ थी
और इस प्रश्न का उत्तर आज तक नही मिला है


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