बोतल महँगी है तो क्या हुआ, थैली खूब सस्ती है

एकलव्य मानव संदेश

बोतल महँगी है तो क्या हुआ, थैली खूब सस्ती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
यहाँ जन्मते हर बालक को, पकड़ा देते हैं झाडू।
वो बेटा, अबे, साले, परे हट, कहते हैं लालू कालू गोविंदा और मिथुन बन कर, खोल रहे हैं नाली।
दूजा काम इन्हें ना भाता इसी काम में मस्ती है।।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है
सूअर घूमते घर आंगन में, झबरा कुत्ता घर द्वारे वह भी पीता वह भी पीती, पीकर डमरू बाजे भूत उतारें रातभर, बस रात ऐसे ही कटती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
ब्रह्मा विष्णु इनके घर में, कदम कदम पर जय श्रीराम। रात जगाते शेरोंवाली की...... करते कथा सत्यनाराण..।। पुरखों को जिसने मारा उसकी ही कैसिट बजती है।
ये दलितो की बस्ती है ।
यहाँ बरात मैं बलि चढ़ाते, मुर्गा घेंटा और बकरा बेटी का जब नेग करें, तो माल पकाते देग भरा जो जितने ज्यादा देग बनाये उसकी उतनी हस्ती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
तू चूहड़ा और मैं चमार हूँ, ये खटीक और वो कोली।
एक तो हम कभी बन ना पाये, बन गई जगह जगह टोली।।
अपना मुक्तिदाता को भूले, गैरों की झांकी सजती है।
ये दलितो की बस्ती है ।।
हर महीने वृंदावन दौड़े, माता वैष्णो छ: छ: बार।
गुडगाँवा की जात लगाता, सोमनाथ को अब तैयार।।
बेटी इसकी चार साल से, दसवीं में ही पढ़ती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
बेटा बजरंगी दल में है, बाप बना भगवा धारी भैया हिन्दू परिषद में है, बीजेपी में महतारी। मंदिर मस्जिद में गोली, इनके कंधे चलती है।
ये दलितो शुद्रों की बस्ती है ।
आर्य समाजी इसी बस्ती में, वेदों का प्रचार करें लाल चुनरिया ओढ़े, पंथी वर्णभेद पर बात करें चुप्पी साधे वर्णभेद पर, आधी सदी गुजरती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
शुक्रवार को चौंसर बढ़ती, सोमवार को मुख लहरी।
विलियम पीती मंगलवार को, शनिवार को नित जह़री।।
नौ दुर्गे में इसी बस्ती में, घर घर ढोलक बजती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
नकली बौद्धों की भी सुन लो, कथनी करनी में अंतर।
बात करें बौद्ध धम्म की, घर में पढ़ें वेद मंतर।।
बाबा साहेब की तस्वीर लगाते, इनकी मैया मरती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
औरों के त्यौहार मनाकर, व्यर्थ खुशी मनाते हैं। हत्यारों को ईश मानकर, गीत उन्हीं के गाते है।।
चौदह अप्रैल को बाबा साहेब की जयंती, याद ना इनको रहती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
डोरीलाल इसी बस्ती का, कोटे से अफसर बन बैठा।
उसको इनकी क्या पड़ी अब, वह दूजों में जा बैठा।।
बेटा पढ़ लिखकर शर्माजी, बेटी बनी अवस्थी है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
भूल गए अपने पुरखों को, महामही इन्हें याद नहीं।
अम्बेडकर बिरसा बुद्ध, वीर ऊदल की याद नहीं।
झलकारी को ये क्या जानें, इनकी वह क्या लगती है।
ये दलितो शुद्रो की बस्ती है ।
मैं भी लिखना सीख गया हूँ, गीत कहानी और कविता। इनके दु:ख दर्द की बातें, मैं भी भला कहाँ लिखता था।।
कैसे समझाऊँ अपने लोगों को मैं, चिंता यही खटकती है।
ये दलितों शुद्रो की बस्ती है।।
इंजी. पीपी श्रीवर
मेरठ द्वारा संग्रहित

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