क्या डॉ संजय कुमार निषाद जी का विरोध करने वालों को राज्य सभा की कार्यवाही से सीख नहीं लेनी चाहिए ?

अलीगढ़, एकलव्य मानव संदेश एडिटोरियल, 25 जुलाई 2017। पिछले दिनों राज्य सभा मे निषाद वन्स और निर्बलों को सीख देने वाली 2 घटनायें घटित हुईं।
एक बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने समाज पर बड़ते अत्याचारों की बात जब राज्य सभा में रखी तो उनको सत्तीधारी सांसदों ने बोलने से रोकने के लिए पूरी ताकत लगादी। और मायावती ने बिना कोई समय गंवाये तुरंत अपनी राज्य सांसदी से त्याग पत्र दे दिया। त्याग पत्र में भी अपनी भावनाओं को लिखा कि में जिनके लिए चुनकर आई हूँ और उनकी बात सदन में नहीं रख सकती हूँ तो मुझे इस सदन में बने रहने का कोई हक नहीं है।
एक और घटना शरद यादव के द्वारा बेवाकी से राज्य सभा में दिया गया वक्तव्य कि, फूलन देवी का हत्यारा शेर सिंह राणा ही मुजफ्फरनगर हिंसा का मुख्य सूत्रधार है।
ये दोनों ऐसी सच्चाई भारी कड़वी बातें हैं जिनको अंधे बनकर सुनते रहने वाले कभी भी निर्बलों को शक्ति नहीं पहुंचा सकते हैं।
अब बात है निषाद वन्स के कुछ मूर्ख और घमंडी चाल बाज़ और अपने भले के लिये बीजेपी, सपा, कांग्रेस और बसपा में घूमने वाले, पूरी जिंदगी आरक्षण के नाम पर नाटक करने वाले नेताओं की, जिनकी रोजीरोटी का सहारा राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद और निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल(निषाद पार्टी) के उदय और निर्बलों, निषादों के मशीहा, डॉ संजय कुमार निषाद के करिश्माई नेतृत्व ने लगभग समाप्त कर दिया है, वो ही बीजेपी, सपा, कांग्रेस और बसपा की नैया को पार लगाने के लिये, निषाद वंशीयो को भड़काने में पूरी ताकत लगा रहे हैं, निषाद पार्टी को रोको, नहीं तो हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा।
दोस्तो अब समय आपकी परीक्षा का है, कि आप गुलामी की जिंदगी जीना चाहते हैं या शेर की जिंदगी।
आप गुलाम मानसिकता के व्यक्ति का नेतृत्व स्वीकार करना चाहते हैं या एक ऐसे व्यक्ति का, जो आपको राजसत्ता में पहुचाने के लिए कटिवद्ध हो। एक ऐसे नेतृत्व के साथ चलना चाहते हो जो सभी निषाद वंशियों को एकता के सूत्र में बांधता हो या ऐसे नेतृत्व के साथ जो आपको अलग अलग जातियों में बंटे रख कर केवल अपनी रोटी सेंकते रहे हैं या चाहते हैं।
भाइयो/बहनों/बुजुर्गो/बच्चो किसी भी संगठन को चलाने के लिए एक विचार धारा की जरूरत होती है।एक कुशल नेतृत्व की जरूरत होती है। अनुशाषित टीम की जरुरत होती है। समय देने वाले कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है। साहित्य की जरूरत होती है। एक राजनीतिक दल की जरुरत होती है। और इन सबका बाप और कलयुगी भगवान यानी धन की जरूरत होती है। धन दो जगह से मिलता है एक जिनके लिए आप लड़ना और संगठन चलाना चाहते हो, उनसे सहयोग लें या जिनकी गुलामी करना चाहते हो उनके पैसे से अपने लाभ के लिय अपनी जनता को बेवकूफ बना कर आगे बढ़ें।
आज राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद ने निषाद वंशीयो के पैसे से 70 साल में पहली ही बार में निषाद वंशीयो को धोका देने वाली सपा, बसपा और कांग्रेस को रसातल में पहुचाने का कार्य किया। निषाद पार्टी केवल 60 जगह पर चुनाव लड़ी और लगभग 6 लाख वोट लेकर एक विधायक जिताकर आपकी आवाज पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुचाने का कार्य किया।
क्या आज पूरे देश में निषाद वंशीयो की दुर्दशा, शोषण, अशिक्षा और बेरोजगारी की आवाज़ संसद में जोरदारी से रखने वाला कोई प्रतिनिधि है ? शायद नहीं और अगर कोई सच्चा निषाद का लाल है तो आये अपना त्याग पत्र देकर लोक सभा या राज्य सभा से मायावती की तरह, फूलन देवी की हत्या की जांच सीबीआई से कराने और आरक्षण को लागू कराने की बात पर, निषाद पार्टी उसे अपना मुखिया मानकर निर्बलों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए साथ देने को तैयार है।
और अगर नहीं है कोई तो हम सभी निषाद वंशीयो से आवाहन करते हैं कि आज आपको पहचाना होगा कि जो लोग निषाद पार्टी और डॉ संजय कुमार निषाद जी का विरोध कर रहे हैं, तो कहीं ये नेता और कार्यकर्ता पैसे के लालच में निषाद पार्टी को बदनाम करके इन बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस को तो मजबूत नहीं कर रहे हैं, जो नहीं चाहती हैं कि निषाद वंशिय आगे बढ़ें।
आपका विवेक ही निषाद वंश का गौरव बढ़ाएगा।
जय निषाद राज।
डॉ संजय कुमार निषाद जिंदाबाद
निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल जिंदाबाद
राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद जिंदाबाद
(लेखक, जसवन्त सिंह निषाद, राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद, एकलव्य प्रान्त-उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष, मध्यप्रदेश के प्रभारी और एकलव्य मानव संदेश के संपादक/प्रकाशक हैं)