सिद्धार्थनगर जनपद के लगभग 900 गांव अब तक आ चुके हैं प्रलयकारी बाढ़ की चपेट में

सिद्धार्थनगर, एकलव्य मानव संदेश रिपोर्टर प्रदीप निषाद की रिपोर्ट। बाढ़ के बाद लोगों के पास बस आस है, आँखो मे पानी है और अब सिद्धार्थनगर की यही कहानी है। इस जनपद को बाढ़ विरासत में मिली है। किन्तु यह बाढ़ सन 1998 की बाढ़ को मात देते हुए तबाही की इबारत लिख दी। बाढ़ से बचने के लिए जनपद में कुल 39 बांधो के निर्माण करोड़ो की लागत से किया गया जिससे जनपद वासियों को प्रलयकारी बाढ़ से निजात मिल सके। किन्तु सन 1998 की इबारत को दोहराती पलयंकारी बाढ़ जनपद में तबाही मचा रखी है। हर तरफ बस तबाही है, गम के साये है, सूनी आंखो में सिर्फ पानी है, यही कहानी जनपद की जिन्दगानी को चरितार्थ कर रहा हे। बाढ़ पीड़ितो के आंसुओ के सैलाब को पोछने में शासन और प्रशासन नाकाफी साबित हो रहा है। प्रशासन के आंकड़ो के मुताबिक जनपद के 643 गांव बाढ़ से प्रभावित है और 223 गांव मैरूण्ड है। जनपद की सभी नदियां खतरे के विन्दु से ऊपर बह रही है। लगभग पौने तीन लाख की जनसंख्या बाढ़ के तबाही की शिकार है। अब तक केवल 404 परिवारो में ही राहत वितरित की गई है। ये सरकारी आंकड़े हैं। ऐसी स्थिति में मैरूण्ड गांवो में ऐसे भी गांव हैं, जिनके घरो में पानी घुस गया है और लोग अपने भवनो के छतो पर तथा नदी के बांधो पर कुछ ऊंचे स्थानो पर अपने आशियाना को बनाकर राहत की बाट जोह रहे हैं।
सबसे दुखद पहलू यह है कि किसानो के सामने ही उनके गाढ़ी कमाई के फसल बाढ़ की भेंट चढ़ जा रही है। जिसमें से कुछ ने तो कर्ज लेकर फसल लगायी थी और कुछ कर्ज चुकाने की आस में लगे हुए थे। कुछ बेटी की शादी और बेटे की पढ़ाई की मंशा सजोये थे। किन्तु किसानो की ऐसी मंशा पर बाढ़ ने ऐसी तबाही मचायी कि उनके आशाएं धरी की धरी रह गयीं। इतना ही नहीं तबाही का आलम यह है कि कितने मासूम से लेकर मरीज, गर्भवती महिलाएं प्रसव पीड़ा से पीड़ित होकर ईश्वर के सहारे जीने को मजबूर है। अधिकांश बाढ़ पीड़ित तो दूषित जल पीने के लिए मजबूर है। जहां प्रशासन द्वारा बाढ़ पीड़ितो के घाव पर बाढ़ सामग्री का कुछ मरहम लगाया जा रहा है वहीं स्वच्छ पानी न के बराबर है। अब तक सरकारी आंकड़ो के मुताबिक 1500 ली0 पानी बाढ़ पीड़ितो में वितरित किया गया। जहां पौने तीन लाख आबादी बाढ़ से पीड़ित है। ऐसी स्थिति में 1500 ली0 पानी उनके गले को कैसे तर करेगी। आज भी तबाही का मंजर देखकर मानवता भी शर्मसार हो रही है। ऐसी स्थिति में भी बाढ़ पीड़ित अपने आशियाने को छोड़ने के लिए तैयार नही है। बस उन्हे एक अदद नाव की दरकार है।जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासन भी इस बात को मान रहा हैं कि इस प्रलयकारी बाढ़ में बाढ़ पीड़ितो को राहत पहुंचाना वर्तमान में नाकाफी हैं। और यह बाढ़ तबाही के मंजर की इबारत लिख गयी।