मानसिक गुलामी ही शोषित बनाती हैं

गाजियाबद, एकलव्य मानव संदेश रिपोर्टर जुगल किशोर निषाद और नीरज कश्यप की प्रस्तुति, 8 अगस्त 2017।  रेगिस्तानी मैदान से एक साथ 100 ऊंट अपने मालिक के साथ जा रहे थे। अंधेरा होता देख मालिक एक सराय में रुक गया। 99 ऊंटों को ज़मीन में खूँटियाँ गाड़कर उन्हें रस्सी से बांध दिया मगर एक ऊंट के लिए खूंटी और रस्सी कम पड़ गई। सराय में खोजबीन की पर व्यवस्था नहीं हो पाई। तब सराय के मालिक ने ऊंट के मालिक को सलाह दी कि तुम खूंटी गाड़ने जैसी चोट मरो और ऊंट को रस्सी से बांधने का दिखावा करो। यह बात सुनकर मालिक हैरानी में पड़ गया पर दूसरा कोई रास्ता नहीं था इसलिए उसने वैसा ही किया। झूठी खूंटी गाड़ी गई, चोटें की गईं और रस्सी से बाँधने का अभिनय भी किया गया। इस प्रक्रिया के पश्चात् ऊंट उसी जगह बैठा और सो गया। सुबह जब 99 ऊंटों की खूँटियाँ उखाड़ीं और रस्सियां खोलीं तो सभी ऊंट उठकर चल पड़े पर वो एक ऊंट बैठा रहा। मालिक को आश्चर्य हुआ, अरे! यह तो बंधा भी नहीं है फिर भी उठ नहीं रहा। सराय के मालिक ने कहा, तुम्हारे लिए वहां खूंटी का बंधन नहीं है मगर ऊंट के मस्तिष्क में है। जैसे रात में खूँटी गाड़ने का अभिनय किया था वैसे ही अब खूंटी उखाड़ने और रस्सी खोलने का अभिनय करो। मालिक ने रस्सी खोली और खूंटी उखाड़ दी जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। इसके बाद ऊंट उठकर चल पड़ा।
न केवल ऊंट बल्कि मनुष्य भी ऐसी ही खूंटियों से और रस्सियों से बंधे होते हैं जिनका कोई अस्तत्व नहीं होता। मनुष्य बंधता है अपने ही गलत दृष्टिकोण से, मिथ्या सोच से, विपरीत मान्यताओं की पकड़ से। ऐसा व्यक्ति सच को झूठ और झूठ को सच मानता है। उसके आदर्श और आचरण में लंबी दूरी होती है। इसलिए ज़रूरी है कि मनुष्य का मन जब भी जागे लक्ष्य का निर्धारण सबसे पहले करे। बिना उद्देश्य मीलों तक चलना सिर्फ थकान, भटकाव और निराशा देगा मंजिल नहीं। स्वतंत्र अस्तित्व के लिए मनुष्य में चाहिए सुलझा हुआ दृष्टिकोण, देश, काल, समय और व्यक्ति की सही परख, दृढ़ संकल्प शक्ति, अखंड आत्मविश्वास और स्वयं की पहचान।

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