मेरी और मेरे वंसजो की उपेक्षा कब तक ???

अलीगढ़, एकलव्य संदेश एडिटोरियल, 6 सितंबर 2017। जिस राजा का किला हज़ारों वर्ष से आज तक अपने विशालकाय नीव के साक्ष्य के साथ विद्यमान हो, उस राजा को खानावदोश की तरह हमारे पुराणों में दर्शाया गया हो, ऐसे पुराणों और प्रवर्तकों का विनाश नहीं होगा तो क्या होगा ?
आज तक जिस राम को पुरुषोत्तम राम की उपाधि और उनकी प्रसंशा ठूँस ठूँस कर पुराणों में की गई है। उनके अनुयायी जन्म स्थली तक के होने लिए संघर्स करते दिख रहे हैं। पर उन्ही से जुड़े निषादराज गुह्यराज महाराज का किला आज भी श्रृंगवेरपुर में ताल ठोक कर चुनोती दे रहा है कि मेरे अस्तित्व को जंगली,अछूत, शुद्र इत्यादि नाम देने वालो तुम्हारे राम थे, हो सकता वह देश का कोर्ट तय करेगी, जो हकीकत में पौराणिक मान्यताओं को मानती भी नहीं, ऐसे में क्या कोर्ट यह साबित करने का अधिकार रखती हैं कि राम का जन्म स्थली भी कोई है ? अगर हैं तो उसका सबूत होना चाहिए, पर सबूत कौन लाएगा ?
क्योकि सबूत और गवाह के आधार पर ही कोर्ट का निर्णय होता हैं।
पर मैं गुहराज निषाद राजा था और आज भी हूँ। फिर मेरा अनादर, क्यों ???
मेरे किले का पुनरुद्धार कब होगा ? 
मेरे किले का संरक्षण कब होगा ??
मैं ही हूँ जिसने राम को पहली बार भगवान की उपाधी दी थी। मैं ही हूँ जिसने राम को सबसे पहले वन जाने पर आश्रय दिया था।
मैं हीं हूँ जिसके चाचा श्रृंगिराज निषाद के प्रयास से राम ही राम और उनके भाई भरत, लक्षण और सत्रुघ्न का इस धारा पर जन्म हुआ था, क्योंकि दशरथ तो नपुंसक थे।
मैं ही हूँ जिसके राज्य में आकर भगवान राम ने पहली बार पवित्र गंगा नदी को मेरी नाव में बैठकर, मेरे नौका चालक, नत्था केवट, के सहारे पार किया था।
मैं ही हूँ जिसके वंसजो के घाटों पर आज भी स्वर्ग जाने की आस लगाने वाले अंतिम संस्कार की रस्म बड़ी ही श्रध्दा से करने आते हैं और श्राद्ध की प्रक्रिया को भी श्रध्दा के साथ पूरी करते हैं।
मैं ही हूँ जब मेरा और मेरे वंसजो का शासन इस देस की धरती पर था तब इस देस का एक रुपया विदेश में 3 रुपये में चलता था।
में ही हूँ जिसके वंसजो ने दुनिया को खेती करना सिखाया था।
मेरी उपेक्षा जब तक करते रहोगे, राम का मंदिर भी नहीं बन पाएगा।
मेरे वंसजो के अधिकारों को आज आरक्षण के सहारे जल्दी से दिलाओ।
मेरे वंसजो ने हमेशा इस धरती की सेवा बहुत ही श्रद्धा भाव से की है। कभी देस के साथ गद्दारी नहीं की है, कुर्बानी देने में भी सबसे आगे रहे हैं।
पहले मेरी भूमि का विकास करो !!
पहले मेरे किले का निर्माण कराओ !!!
राम का मंदिर, बनाने में मेरे वंसज आज भी आपका सहारा बन सकते हैं।
इस लिये मैं पूछना चाहता हूँ कि-
मेरी और मेरे वंसजो की उपेक्षा कब तक ???
(एकलव्य मानव संदेश की संपादकीय प्रस्तुति)