निषाद वंशीय जतियों को निकाय चुनाव में लगेगा बड़ा झटका ?

अलीगढ़, एकलव्य मानव संदेश एडिटोरियल, 17 अक्टूबर 2017। उत्तर प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव द्वारा जारी शासनादेश संख्या-234/2016/29सी.एम/26-3-2016-3(15)/2007 के अनुपालन के लिये 22 दिसंबर 2016 को
और
31 दिसंबर 2016 को लखनऊ से कार्मिक अनुभाग -2 द्वारा जारी शासनादेश संख्या - 4(1)/2002-का-2,

समाज कल्याण अनुभाग -3 द्वारा जारी शासनादेश संख्या-01/2017/455 मंत्री/26-3-2016 लखनऊ दिनांक 02 जनवरी 2017
और
कार्मिक अनुभाग - 2 द्वारा जारी शासनादेश संख्या -1/2017/4(1)/2002-का-2 लखनऊ, दिनांक 12 जनवरी 2017
के अनुसार अब कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिन्द, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी, मछुआ को पिछड़े वर्ग की सूची से निकाल कर अनुसूचित जाति की सूची में शामिल कर लिया गया है।
इसके अनुपालन में 29 मार्च को हाई कोर्ट ने भी लगी रोक को हटा दिया है कि इन जतियों के लिए अनुचित जाती के प्रमाण पत्र बनाने पर अगले आदेश तक कोई रोक नहीं है। और जो भी प्रमाण पत्र बनेंगे उन पर कोर्ट का अगला आदेश लागू होगा।
अब उपरोक्त 17 जतियों के अनूसूचित जाती के प्रमाण पत्र के बनने में उत्तर प्रदेश की अदित्य नाथ योगी जी की सरकार को केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन के लिए एक आदेश जारी करना है। जो यह सरकार 6 महीने से ज्यादा समय बीतने पर भी नहीं कर रही है और इन जतियों के साथ एक तरह से खिलबाड़ ही कर रही है।
सरकार के आदेश जारी न कर पाने की वजह से इस समाज को मिलने वाले लाभों से भी वंचित रहना पड़ रहा है।
अब जब उक्त शासनादेश आज भी प्रभावी हैं और अगर  इन जातियों के लोगों ने निकायों के चुनावों में पिछड़े वर्ग की आरक्षित सीट से चुनाव लड़ा तो उसे कोर्ट में कोई भी आसानी से चुनौती दे सकता है और जीते प्रत्याशी को चुनाव से बाहर कर सकता है।
इस लिए अब ये जतियाँ कानूनी रूप से न पिछड़े वर्ग का लाभ ले सकती हैं और न ही अनुसूचित जाति का ले पा रही हैं।
इस सभी के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार और इन जातियों के भूखे राजनेता जिम्मेदार हैं। सरकार जानती है कि इस समाज के कुछ बिकाऊ और लालची व कम जानकारी के के नेताओं को अपने साथ लगाकर इस जाति को मूर्ख बनाते रहो। बिजेपी के नेताओं को अपनी पार्टी के स्तर पर अपनी बात भी रखनी नहीं आती है। इन नेताओं ने अपने लालच में समाज को पीछे कर रखा है।
क्या निषाद वंशीय बीजेपी के विधायक, सांसद, मंत्री हाई कोर्ट के आदेश को भी नहीं पड़ और समझ सकते हैं। अगर नहीं तो इस पार्टी के द्वारा निषाद वंशीय जतियों को उनके हक अधिकारों से वंचित कराने में इन नेताओं की भूमिका भी मानी जाएगी।
क्यों कि बालू खनन, मोरंग, मछली पालन पर इन जातियों के अधिकारों को यह सरकार पहले ही छीन चुकी है और नेता मौन हैं।