मूलवासी सेना ने सन्त शिरोमणि बाबा गाडगे का मनाया परिनिर्वाण दिवस

सीतापुर, एकलव्य मानव संदेश रिपोर्टर, 21 दिसम्बर 2017। भले ही खाना हथेली पर रखकर खाओ , थाली भले ही न ले पाओ, पत्नी की साड़ियां भले ही ज्यादा न ले पाओ और भले ही ऐशो आराम का जीवन न जी सको लेकिन अपने बच्चों को जरूर पढ़ाओ।
           यह बात समाजसेवी रामस्वरूप कनौजिया ने सन्त शिरोमणि बाबा गाडगे के परिनिर्वाण दिवस के अवसर आयोजित एक बैठक में कहीं। मूलवासी सेना के आवाह्न पर क्षेत्र के मंझारी चौराहे पर उन्होंने आगे कहा कि सन्त गाडगे स्वच्छता के नायक थे।जीवन पर्यन्त गन्दगी के धुर विरोधी रहे। उनका मानना था कि गन्दगी चाहे कूड़ा-कचरा की हो, चाहे सामाजिक गन्दगी हो, चाहे भ्रष्टाचार के रूप में हो, उसे खत्म करना ही मेरा मुख्य मकसद है। सन्त गाडगे सदैव मन्दिर बनाने के विरोध में रहे। क्योंकि इनका मानना था कि मन्दिर से लोग अन्धविश्वास, पाखण्ड व आडम्बर की जाल में फंस जाते हैं। इसलिए मन्दिर के स्थान पर विद्यालय बनवाये जाने चाहिए। जिससे अन्धविश्वास, पाखण्ड व आडम्बर का शमन हो सके और शिक्षित समाज और विकसित राष्ट्र जन्म ले सके। राष्ट्र सन्त बाबा गाडगे जी गरीब कन्याओं के विवाह कराने के समर्थक थे व गरीबों के रहने के लिए आवास बनवाए जाने के पक्ष में भी थे। इसलिए इन्होंने अपने जीवन में भीख मांगकर अनेक विद्यालय, धर्मशाला और गौशाला का निर्माण कराया। लेकिन अपने लिए कुटिया तक नहीं बनवाई। ऐसे थे महान राष्ट्रप्रेमी सन्त बाबा गाडगे जी, अदभुत ब्यक्तित्व था।
सामाजिक कार्यकर्ता व मूलवासी सेना के सिपाही राजेश कश्यप ने कहा कि पूज्य बाबा सन्त गाडगे ने समाज सुधार की दिशा में जो कहानी लिखी है वह काबिले तारीफ है। बाबा गाडगे के सामाजिक कार्यों से डा बी आर अम्बेडकर बहुत प्रभावित थे। इसलिए गाडगे जी से सलाह-मशविरा लिया करते थे। सन्त गाडगे के प्रयासों से दर्जनों शिक्षण संस्थाएं खोली गईं। जो अशिक्षा के अन्धकार में जीवन जी रहे लोगों के लिए विशेष रोशनी साबित हुईं। अपने कीर्तन-भजन के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक समस्याओं पर कड़ा प्रहार भी किया। ऐसे समाज सुधारक, स्वच्छता मुहिम के अगुआ, दबे-कुचलों के मसीहा को बार बार नमन व अभिनन्दन है।
        इस मौके पर समाजसेवी डीसी रावत, रामप्रकाश राजपूत, गिरजा शंकर गोस्वामी, सुरेश भार्गव, बुधईराम, केडी सिंह, हरिद्वारी यादव आदि उपस्थित रहे।