तुलसीदास की तरह, दलित ग्रंथ व दलित अनुयायी भी हमें भ्रमित करके हमारे अस्तित्व मिटाते गए हैं

गोरखपुर, एकलव्य मानव संदेश के माध्यम साभार, द्वारा डॉ. संजय कुमार निषाद (राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (N.I.S.H.A.D. पार्टी) भेजा गया लेख, 6 जनवरी 2018। जय निषाद राज महेन्द्र जी की फेस बुक वाल से दलित लेखकों और परिवतर्नवादियोंको हम मूलवासी उसी तरह से ठूस ठूस कर अपने दिमाग में भर लिए हैं जैसे स्वयं के संस्कृति प्रकृति और स्वयं के पूर्वजो के संघर्ष और महानं महर्षि वाल्मीकि की जगह तुलसी दास हो। जिस प्रकार हमें तुलसीदास ने सदियों से भ्रमित किया है उसी प्रकार से आज और दसकों से दलित ग्रथ व दलित अनुयायियों ने भी हमें भ्रमित करके, हमारे अस्तित्व मिटाते गए हैं। आज हम डॉ अम्बेडकर को अपना मशीहा मानते हैं पर डॉ जैपालमुंडा को जानते तक नहीं हैं। पर हकीकत यह है कि जब देश में वंचितों की बात चली तो डॉ मुंडा ने मूलवासी और अंगेरजों से टक्कर लेने वालों की बात को प्राथिमिकता की बात की और सम्पूर्ण भारत में मूलवासी मतलब आदिवासी लोगों के अधिकार की बात की, पर डॉ अम्बेड़कर ने दलित और अछूत। मतलब जो लोग अंग्रेजों और राजाओं के गुलाम थे उनके लिए बात की।
मेरा तात्यपर्य यह की इस मानसिकता से हमें बाहर निकलना, हमारी स्वयं की सोच और सूझ बूझ जरुरी है।
आज अगर हमारे समाज, मूलवासी आदिवासी समाज के लोग जब अनुसूचित जाती के अधिकार की बात करते हैं तो सबसे ज्यादा विरोध यही दलित लोग करते हैं, कि हम अपने दलित अधिकार आरछण में किसी भी अन्य लोगो को सामिल नहीं होने देंगे।
जब हम दलित अधिकारो का हकदार नहीं हैं, तो फिर भीम वादी और दलित वादी  कैसे हो सकते हैं। हमें इन दो धारी तलवारो को समझना पड़ेगा। और स्वयं के अधिकार के लिए इन कथित ताकतों से सावधान होना पड़ेगा।
जय पाल मुंडा के जन्म दिवस पर सत सत् नमन
साभार, द्वारा डॉ. संजय कुमार निषाद (राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (N.I.S.H.A.D. पार्टी)