जाकी रही भावना जैसी , तिन देखी मूरत तैसी

गोरखपुर, एकलव्य मानव संदेश के लिए कमलेश निषाद का लेख, 27 जनवरी 2018।  गर्मी का महीना था। दोपहर का समय था। चिलचिलाती धूप मे मैंने एक आदमी को काला चश्मा लगाए हुए जाते देखा तो मैंने उससे पूछा भाई धूप बहुत तेज है थोड़ा आराम कर लो धूप थोड़ा कम हो जाने दो तब जाओ। तो उसने कहा अरे भाई मैं काला चश्मा लगाया हूं, तो मुझे धूप कैसे लगेगी। मैंने उससे पूछा इस काला चश्मा लगाने से धूप में आपको कया फायदा है ? जबकि काला चीज गर्मी को अपने अंदर अवशोषित करता है। तो उस काले चश्मे वाले आदमी ने कहा नहीं भाई, काला चश्मा लगाने से धूप नहीं दिखाई देती है बल्कि धूप धुंधला दिखाई देटी है। मात्र धुंधला दिखाई देने से ही यह अनुभूति होती है कि आगे धूप नहीं है और आगे की यात्रा आराम से पूरी हो जाती है।
साथियों  जय निषाद राज , जय भारत ।