मूलवासी निषाद सावधान !! बीजेपी और कांग्रेस में शर्मनाक करार ??-डॉ.संजय कुमार निषाद

गोरखपुर, एकलव्य मानव संदेश रिपोर्ट, 2 फरवरी 2018। मूलवासी निषाद सावधान !! बीजेपी और कांग्रेस में शर्मनाक करार ?? राजस्थान उपचुनाव के परिणाम आए हुए 24 घंटे भी नहीं हुए कि सियासत में कयासों का बाजार गर्म हो गया है। इस उपचुनाव से जहां कांग्रेस-अति उत्साहित नजर आ रही है, वहीं बीजेपी किसी भी तरह की बयानबाजी से दूर दिख रही है। आमतौर पर विवादों और उत्साहित रहने वाली बीजेपी थिंक टैंक तीन सीटों पर हार से इतनी खामोश क्यों है ? ये विषय इतना सरल नहीं है, जितना दीख रहा है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस इस जीत को जनतंत्र की जीत और मोदी से मोहभंग बता रही है। जश्न की मिठाई अजमेर से लेकर कांग्रेस मुख्यालय तक बांटी जा रही है। लेकिन इसके बीच जो अहम सवाल आमजनता के मन में उठ रहा है कि क्या अब ईवीएम ठीक हो गया या फिर ईवीएम कोई मुद्दा था ही नहीं। इन सारे सवालों और कयासों के मद्देनजर हमें वो सब कारण और कारक तलाशने चाहिए कि क्या इस देश में ईवीएम कोई मुद्दा है भी या नहीं ? क्या कांग्रेस बीजेपी की सधी रणनीति का शिकार तो नहीं हो रही या कांग्रेस बीजेपी की योजना पर काम तो नहीं कर रही है। ये सवाल पहले चरण में आपको बचकाना दिख सकते हैं लेकिन सवाल उससे कहीं गंभीर और चिंताजनक है।     
           लोकसभा में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला और उसके बाद ये सिलसिला जारी रहा, खासकर उत्तरप्रदेश में जिस जनादेश ने सरकार को कायम किया वो इतनी आसानी से हजम होने जैसा नहीं है। ध्रुवीकरण तो हो सकता है, परिणाम बदल सकते हैं लेकिन दलित और मुसलमान वोटरों से जमीनी पड़ताल करने पर पता चला कि ये जनतंत्र की वाकई जीत नहीं है। क्योंकि जहां जिनका जनादेश है, जिन्होंने वोट बीजेपी को दिया ही नहीं वो सीटें बीजेपी रिकॉर्ड वोट से कैसे जीत सकती है। और ये महज एक सीट का मामला भर नहीं था। उसके बाद भी जहां-जहां ईवीएम टेस्ट किए गए, पहला वोट बीजेपी को ही क्यों गया। और फिर उसे तकनीकी भूल मानकर मुद्दे को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया गया ? अब अगर बीजेपी समीक्षक मानकर इस जीत हार का मूल्यांकन किया जाए तो पता चलेगा कि ये जीत कांग्रेस को 2019 में लॉलीपॉप देने जैसा है, और इस जीत को देकर बीजेपी ये बात स्थापित करना चाहती है कि अगर ईवीएम में खामियां या जुगाड़ होता तो हम ये सीटें क्यों हारते। और इस तरह से बीजेपी 2019 में फिर सत्ता का संचालन करती हुई दिख सकती है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के रणनीतिकार के तौर पर देखा जाए तो ये बीजेपी से सीधे-सीधे सेटिंग-जुगाड़ का मामला दिखता है। कांग्रेस भी ये चाहती है कि बीजेपी और मोदी 2024 तक देश की कमान संभालें, तबतक राहुल स्थापित भी हो जाएंगे और बीजेपी अपना वादा निभाते हुए कांग्रेस को जीत प्रदान कराने की भूमिका में होगी। क्योंकि इसमें दोनों का हक परस्पर छिपा हुआ है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ये चाहती हैं कि जितना हो सके क्षेत्रिय दल सत्ता और सियासत से दूर रहैं। क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों अभिजात्य तबके और पूंजीपति तबके को संरक्षित और पोषित करती है जहां क्षेत्रिय दल उनके एजेंडे पर पानी फेर देते हैं। और इसका उदाहरण क्षेत्रिय दलों के उद्भव और विस्तार से है। इसलिए ये बात इतनी आसान नहीं है कि कांग्रेस ने बीजेपी को धूल चटा दी, कांग्रेस के राहुल ने मोदी के मंदिर एजेंडे को फेल कर दिया, नोटबंदी और महंगाई ने वसुंधऱा को जवाब दिया। बात ये है कि कांग्रेस और बीजेपी का परदे के पीछे ये गठजोड़ हिंदुस्तान के अवाम के लिए ठीक नहीं है। और ये दोनों मिलकर जनता को ये संदेश देने में कामयाब हुए हैं कि हम हीं देश का संचालन कर सकते हैं।
   इस बात पर गौर करने पर पता चलेगा कि कभी कांग्रेस ने तो कभी बीजेपी ने ही ईवीएम के खिलाफ आवाज उठाई है ? आखिर इसके पीछे का सच सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस को ही क्यों पता है ? इस हालात में क्षेत्रिय दलों पर ये जिम्मेदारी आ गई है कि बीजेपी-कांग्रेस का गठजोड़ बेनकाब किया जाए और ईवीएम फ्रॉड को जनता के सामने लाया जाए। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र का देश अराजक शक्तियों के हत्थे चढ़ जाएगा।
डॉ. संजय कुमार निषाद
राष्ट्रीय अध्यक्ष
निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल
(N.I.S.H.A.D. पार्टी)