डर गई भाजपा निषाद वंसीय नेताओं को नेतृत्व देने से

अलीगढ़, एकलव्य मानव संदेश एडिटोरियल रिपोर्ट, 15 फरवरी 2018। भाजपा ने आपनी उत्तर प्रदेश की कार्यकारिणी में निषाद वंशीय नेताओं पर अविश्वास व्यक्त किया है। हाल ही में घोषित उत्तर प्रदेश की भाजपा की कार्यकारिणी में निषाद वंशीय नेताओं को तवज्जो नहीं दी गई है। इसका एक कारण है कि भाजपा को भी बसपा की तरह लगने लगा है कि अगर निषाद वंस के नेताओं को अपनी कार्यकारणी की सभाओं में प्रवेश दिया गया तो ये हमारी बातों को बाहर लीक कर सकते हैं और हमारी योजनाओं की जानकारी निषाद पार्टी तक पहुंच सकती है। इसलिए किसी भी निषाद नेता को पार्टी में जगह ही नहीं दी जाय। जब निषाद नेता पार्टी को प्रमुख बैठकों में होंगे ही नहीं तो हमारी बात निषाद पार्टी तक नहीं पहुंचेगी। भाजपा ने इसी डर से मथुरा के तेज तर्रार युवा नेता और पूर्व युवा मोर्चा महा सचिव कुंवर सिंह निषाद, पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष बाबू राम निषाद, पूर्व मछुआरा प्रकोष्ठ अध्यक्ष/पूर्व ब्रज प्रान्त उपाध्यक्ष/पूर्व विधानसभा जलालाबाद प्रत्याशी मनोज कश्यप, पूर्व मंत्री हीरालाल कश्यप को इस बार अपनी कार्यकारणी में कोई जगह नहीं दी है। ये वो नेता हैं जिन्होंने में 2017 और 2014 में भाजपा को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
भाजपा को निषाद पार्टी के उभार ने भी विचलित कर रखा है। निषाद पार्टी ने इस बार के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को हराने के लिए अपनी महत्वपूर्ण सहयोगी पीस पार्टी के साथ मिलाकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया है। इस बार समाजवादी पार्टी ने भी लचीलापन दिखाया है और गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा चुनाव जीतने के लिए जबरदस्त घेराबंदी करके भाजपा की नींद हराम कर दी है। आज 7 लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार है कि भाजपा इन दोनों क्षेत्रों में चुनाव लड़ने से डर रही है। क्योंकि भाजपा के सीर्ष नेतृत्व को आभास हो गया है कि इन दोनों सीटों को जीतना अब बहुत ही मुश्किल है। अभी पिछले दिनों राजिस्थान और पश्चिमी बंगाल के उपचुनावों में भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ था। भाजपा के लिए मोदी और योगी का फॉर्मूला अब कष्टदायक साबित हो रहा है। देश और प्रदेश में बेरोजगारी बड़ रही है। मेंहगाई बड़ रही है। अपराध खुलेआम हो रहे हैं। साम्प्रदायिकता का बीज बोया जा रहा है। लोगों का ध्यान बांटने के लिये मंदिर मस्जिद का मुद्दा उठाया जा रहा है। किसानों को अबारा गायों से और परेशान किया जा रहा है। नदियों के किनारे आदि काल से बसे लोगो को उजाड़ा जा रहा है। मकान देने का वायदा करने वाली सरकार मकान तोड़ रही है। भ्रष्टाचार पहले से ज्यादा संगठित तरीक़े से बढ़ गया है। यह बात खुद मंत्री भी स्वीकार कर रहे हैं। 2019 की जगह अब एक साल पहले ही 2014 का नाटक खेला जा रहा है। 
निषाद पार्टी ने उत्तर प्रदेश के लगभग 65 जिलों में अपनी मजबूत पकड़ बनाकर 10 प्रतिशत से ज्यादा वोट संगठित कर लिया है। लोकसभा गोरखपुर में निषाद मतदाताओं की संख्या 5 लाख के लगभग है। यानी कुल वोटों का का लगभग 35 प्रतिशत, जो गोरखपुर लोकसभा चुनाव में भाजपा की नींद हराम किये हुए है। निषाद पार्टी के मुखिया डॉ संजय कुमार निषाद के द्वारा इस सीट पर लगातार आक्रामक प्रचार प्रसार से भाजपा अपना प्रत्याशी भी अभी तक घोषित नहीं कर पाई है। अगर लोकसभा के इन दोनों उपचुनाव में भाजपा हार के करीब खड़ी है और इस चुनाव के बाद योगी आदित्यनाथ की कुर्सी भी बचना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि योगी जी खुद ही अपने शीर्ष नेतृत्व को ये दिखाने में लगे हैं कि अब हमको निषादों की जरूरत नहीं है। और इसीलिए किसी भी निषाद नेता को पार्टी ने बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी है। अब भाजपा को लगने लगा है कि निषाद वंस भाजपा को वोट ही नहीं करेगा तो उसके नेताओं को अपने घर में क्यों घुसने दिया जाय।








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