महामना डॉ संजय कुमार निषाद की दूरदर्शिता को सलाम

अलीगढ़, एकलव्य मानव संदेश एडिटोरियल रिपोर्ट, 6 मार्च 2018। निषाद वंस के हित के लिए कुछ मूर्ख लोगों के द्वारा पैरवी करने और हमेशा चुगली करने और भीख मांगने जैसी हरकत करने से आज तक यह समाज सबसे पीछे रहा है। लेकिन पहली बार एक निर्भीक और तेज़ तर्रार नेतृत्वकर्ता महामना डॉ संजय कुमार निषाद जी ने इस समाज को केवल 5 साल की लघुअवधि में राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय स्तर पर जय निषाद राज के नारे के साथ एक महत्वपूर्ण स्थिति में ला दिया है। निषाद वंस की सभी जातियों धींवर, कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, गौंड, बेलदार, तुरैहा, मेहरा, रायकवार, गोंदिया, खुलवट, चाई, मांझी, बाथम, खरवार, धुरिया, लोधी आदि को पहली बार महसूस होने लगा है कि हम गौरवशाली इतिहास के पुरखों की संतान हैं। और इस भारत देश के असली मालिक हैं। और हमारी एकजुटता ही हमको हमारा खोया हुआ राजपाठ वापस ला सकती है।
मित्रो मशहूर लेखक शिवखेड़ा का कहना है कि जीतने वाले कोई अलग काम नहीं करते हैं, वे उसी काम को केवल अलग ढंग से करते हैं।
महामना डॉ संजय कुमार निषाद ने अपनी शिक्षा और ज्ञान का प्रयोग इसी आधार पर किया और सदियों से विछड़े और सोए हुए समाज को झकझोरने के बाद एकता की और लाकर खड़ा कर दिया और उनमें निषाद वंस का होने में गर्व का अहसास कराया। महामना डॉ संजय कुमार निषाद बताया कि परिंदे भी नहीं रहते हैं पराये आशियाने में और निषाद वंशियों ने तो पूरी उम्र ही गुज़ार दी किराये के मकानों में। 
भारत निषाद वंशियों का देश है। निषादों को आज भी भारत से सबसे ज्यादा लगाव है। भारत की आत्मा भगवान राम के नाम पर निषाद वंशीय लोग सबसे पहले अपनी जान कुर्वान करने के लिए आगे रहते हैं। राम मंदिर के लिए चाहे कल्याण सिंह हों जिन्होंने अपनी कुरसी को लात मार दी और एक दिन की जेल की सज़ा भुगती। चाहे उमाभारती जी हो जिन्होंने मंदिर के लिए मस्जिद को तुड़वाने में अग्रणी भूमिका निभाई और चाहे साध्वी निरंजन ज्योति जी हों। लेकिन इन की मूर्खता ये रही कि ये हमारे पुरखों के हत्यारे और लुटेरों को पहचान नहीं सके और उनके पिंजड़े के कैदी बनकर केवल अपने भले से आगे नहीं निकल सके।
आज फिर से एक निषाद ने राम के मर्म को पहचाना और बताया कि राम तो निषाद वंस की देन है। राम को पैदा होने से लेकर भगवान के रूप में दुनिया में अगर पूजापाठ कराया तो वो श्रंगवेरपुर इलाहाबाद के महाराजा गुह्यराज निषाद राज थे। उनका किला आज भी 1977 की खुदाई के बाद से उपेक्षा का शिकार है और इसी प्रकार से 1992 से राम मंदिर अपनी भव्यता के इंतजार में है। ये मक्कार विदेशी आर्यों की संतान किसी राम के द्वारा जनकल्याण नहीं केवल अपना भला चाहती हैं। लाखों मंदिर हैं उनसे कोई जनकल्याण की योजना नहीं चल रही केवल मनुबाद की दुकान चल रही है। जिनके पुरखों ने स्वयं भगवान राम को वनवास दिया हो वो कभी भी जनकल्याणकारी हो ही नहीं सकते हैं।
महामना डॉ संजय कुमार निषाद ने बताया कि जब भारत पर निषाद वंस का शासन था तो दुनिया में तीन में से एक रुपया भारत का चलता था। भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। भारत के मूलवासी हमेशा देश भक्त रहे हैं। इस लिये अगर मूलवासियों का अगर कल्याण करना चाहते हो तो मान्यवर कांसीराम जी और माननीय मुलायम सिंह यादव जी से सीखो। आज राजा वोट से पैदा होता है और वोट पार्टी में पड़ता है। पार्टी की विजय होने पर सरकार बनती है और सरकार/सत्ता ही सभी तालों की मास्टर चाबी है। और जिस समाज का वोट एकजुट हो जाता है उसके पास सभी दल उसके सहयोग करने के लिए मित्रता करने के लिए आते हैं। आपको भीख में सत्ता नहीं सत्ता में भागेदारी देने के लिए तैयार हो जाते हैं। और आज यही नज़ारा नज़र आ रहा है । निषाद वंस की एकजुटता ने 24 साल के एक दूसरे की जान के दुश्मन बने सपा और बसपा को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। और पीस पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, एनसीपी, और कई छोटी पार्टियों के साथ अब कांग्रेस को भी भाजपा सरकार में हो रही सरकारी बैंकों की लूट, बलात्कार, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, आदि की लड़ाई मिलकर लड़ने के लिए एकता के सूत्र में बंधने को मजबूर कर दिया है। अब सम्पूर्ण विपक्ष उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख नदियों के किनारे, गोरखपुर राप्ती नदी और फूलपुर गंगा नदी के किनारे से फिर नई इवारत 11 मार्च को लिखने जा रहे हैं। इन दो लोकसभा के उपचुनावों में भाजपा को रसातल में पहुँचाने के लिए वोट पड़ेंगे। भाजपा इन दोनों सीटों पर ऐतिहासिक हार का स्वाद चखने जा रही है और यही निषाद क्रांति की पहली विजय होगी। जो 2019 में केंद्र सरकार में आज़ाद भारत के इतिहास में निषाद वंशीय समाज के साथ अन्य शोषित वर्ग की भूमिका को स्थापित करने का काम करेगी। औऱ इन वर्गों के विकास के नए रास्ते खोलकर भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाने में सहायक होगा। 
जय निषाद राज
जय समाजवाद
जय भीम 
जय भारत
जय किसान
जय जवान

लेखक 
जसवन्त सिंह निषाद
संपादक/प्रकाशसक
एकलव्य मानव संदेश
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