निषाद संस्कृति के लोगों की शैक्षिक महत्ता का प्राचीनतम इतिहास


फैज़ाबाद (Faizabad), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) ब्यूरो रिपोर्ट, 23 मई 2018। मंगलम भगवान निषाद राज:, 
मंगलम वीर एकलव्य: ।
मंगलम नल निषाद:, 
मंगलम भगवान कश्यप:।।
"निषाद संस्कृति के लोगों की शैक्षिक महत्ता का प्राचीनतम इतिहास"
       विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता, सैंधव सभ्यता, जब पूर्ण विकसित हुआ करती थी, जिसके निर्माता निषाद थे, उस समय से ही निषाद संस्कृति के लोग आर्किटेक्चर ( निर्माण कार्य ) के क्षेेत्र में बहुत ही निपुण व प्रवीण हुआ करते थे। जिनकी कीर्ति पूरे विश्व मेें अपना परचम लहरा रही थी। उसी के कुछ समयोपरान्त भारत भूमि पर तमाम विश्व विद्यालय बने जिनमें नालन्दा, तक्षशिला, विक्रमशिला, पल्लवी आदि महान विश्वविद्यालय पूरे संसार को ज्ञान बांटकर अपनी पराकाष्ठा को कायम किये हुए थे। उसी समय जब विदेशों से लोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए भारत भूमि पर आते थे। तब ही भारत वासी/निषाद संस्कृति के लोग जिनकी आबादी उस समय सबसे ज्यादा थी उसी दौरान विद्यार्थी व शिक्षक भी सबसे ज्यादा होते थे। उदाहरणत: महर्षि कश्यप, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेद व्यास, महर्षि भार्गव, महर्षि मत्स्येन्द्रनाथ आदि जैसे लोगों ने अपनी विद्वता को दुनिया के सामने रखते हुए रामायण, वेद, पुराणों आदि की रचना कर दुनिया को दिखा दिया कि निषाद संस्कृति कितनी विकसित व शिक्षित थी। एक समय था जब निषाद संस्कृति के लोग पूरे विश्व को ज्ञान दिया करते थे, उसी समय की बात को नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ० अमर्त्यसेन शास्त्री ने लिखा है कि पूरी दुनिया में 3 रूपये में 1 रूपया भारत का चला करता था अर्थात निषाद संस्कृति के लोग पूरी दुनिया को खिलाते व जिलाते थे। किन्तु अफसोस है कि आर्यों ने भारत भूमि पर स्थित तमाम एेसे विद्या के मंदिरों ( विश्वविद्यालयों ) को जलाकर अपनी मूर्खता व मक्कारी का परिचय दिया तथा निषाद संस्कृति के महापुरूषों द्वारा रचित पुस्तकों रामायण, वेद, पुराणों व महाभारत आदि को अपनी जीविका का आधार बनाकर पूरे देश में घूम- घूमकर इसका अपनी सुविधानुसार प्रचार प्रसार किया व इन्ही पुस्तकों के सहारे अपना एक काल्पनिक धर्म भी विकसित किया। 
जो निषाद संस्कृति पूरी दुनिया को ज्ञान देती थी, साहित्यों व ग्रंथों की रचना करती थी, उसी निषाद संस्कृति के वंशज आज साहित्यों व ग्रंथों को देखने व छूने का अवसर भी नही पा रहे हैं। और छोटी-छोटी नौकरियों के लिए दौड़ लगा रहे हैं। तथा बड़ी नौकरियों IAS, IPS, IFS, PCS, PCSJ जैसे पदों पर इनका नाम नगण्य है। 
"यही आज चिंतन का विषय है"। जब वर्तमान दौर में निषाद संस्कृति के लोग शिक्षा से महरूम हैं, रचनाकारों व साहित्यकारों का अता पता नही है। उसी बीच एक ऐसी महान आत्मा, महान साहित्यकार, निषाद रत्न डॉ० संजय कुमार निषाद ने जन्म ले करके "निषाद वंश, निषादों का इतिहास, भारत का असली मालिक कौन" जैसी तमाम पुस्तकों की रचना कर इस संस्कृति और समाज को पुनर्स्थापित करने का कार्य किया है। हम समाज के तमाम बुद्धिजीवियों व सामाजिक संस्थाऔं तथा संगठनों से अनुरोध करते हैं कि वे यदि अपनी पुरानी पराकाष्ठा को कायम रखना चाहते हैं, साहित्यकार, रचनाकार, शिक्षक बनना चाहते हैं तो '' राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद" के मिशन को आगे बढ़ाने में सहयोग करें। जिससे आपका समाज व संस्कृति पुन: उस गरिमामयी स्थिति को प्राप्त कर सके | 
लेखक
 जय निषाद राज 
शान्तोष निषाद 'महाराज' 
अयोध्या फैजाबाद(उ०प्र०)

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