हमें अपनी नश्लों को जिंदगी की सच्चाईयों से आँख मिलाकर बात करने का हुनर सिखाना पड़ेगा-ईं.प्रवीण निषाद

गोरखपुर (Gorakhpur) एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) के लिए गोरखपुर सांसद ईं. प्रवीण कुमार निषाद का लेख, 9 मई 2018। मनुष्य की धरती के साथ दरिंदगी और कुपित धरती का विक्षोभ देखने को मिल रहा है। पिछले सत्तर सालों में न हमने पानी बचाने पर काम किया। न जनसंख्या विस्फोट पर काम किया। न पर्यावरण की रक्षा पर काम किया। न 12 वीं तक ही सही, सभी को  समान शिक्षा पर काम किया। देश का नेत्रृत्व कांग्रेस और भाजपा के हाथ में रहा है। इन दुर्गतियों के लिये कोई दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक दोषी नहीं है। राज्यों  में जरूर लालू, नीतीश, मुलायम, मायावती और अखिलेश की सरकारें थीं। इन लोगों ने भी उसी ढर्रे पर चलकर दोनों प्रदेशों में जमकर भ्रष्टाचार किया है। बुनियादी मूल्यों पर कोई काम नहीं हुआ। उपरोक्त चारों दलों ने संविधान सम्मत भारतीय नागरिक बनाने का काम भी नहीं किया। कुछ नये दल जन्म लेते हैं तो समर्थक सबसे पहले सवाल करते हैं, चुनाव लड़़ना है कि नहीं और किसी से समझौता होगा कि नहीं?? ये सवाल चुनाव से ठीक एक घंटे पहले जन्मे दलों के समर्थक भी करते हैं। इसका अर्थ ये है कि दल बनाने के बाद चुनाव में जरूर  कूदना है और जाति बिरादरी धर्म के आधार पर, झूठ सच बोलकर वोट प्राप्त कर लेने को ही राजनीतिक दलों की नीयति और उद्देश्य मान लिया जाता है। जबकि सबसे पहले दल के संविधान और देश के संविधान के मुताबिक हमें समर्थक और नागरिक तैयार करने का कार्य भी करना चाहिए, राजनीतिक दलों की यह भी महती जिम्मेदारी है। हमने राजनीतिक दलों में लुटेरा होने की संस्कृति पैदा की है। थाने में दलाली हो जायेगी क्या? रिश्वत देकर भी नेता जी नौकरी लगवा देंगे क्या? या नाते रिश्तेदार, समर्थकों को मलाईदार (अवैध कमाई) पोस्टिंग करवा देंगे क्या? रेत, बालू खनन का वैध, अवैध ठेका, पट्टा दिलवायेंगे क्या? बार्डर पर दूध भरा ट्रक में खाद्य अधिकारी और एस.पी.साहब से कहकर पानी मिलवाने देंगे क्या? भारत में यही (work culture) कार्य संस्कृति पैदा हुई है। जबकि सभ्य और ईमानदार को अपने आप संवेदनशील जगह मिल जाने चाहिए। वकील भी वही ढूँढते हैं जो मुकदमे का जनकार भले न हो लेकिन जज साहब से सेटिंग करा के काम करा दे। इसी को हम भारतीय संस्कृति बोलने लगे हैं। जैसे ही कोई इस सड़ी गली व्यवस्था पर चोट करता है तो हमें या उसे, देशद्रोही, धर्म विरोधी और संस्कृति विरोधी करार देकर ट्रोलिंग (गाली गलौज) शुरू कर दी जाती है। आप व्यवस्था या सरकार से सीधा और सपाट सवाल किये नहीं कि आप को देखने का चश्मा बदल दिया जायेगा और गाली गलौज की भाषा इस्तेमाल होने लगेगी। भ्रष्टाचार पर तो सिर्फ इतनी गुंजाइश रह गयी है कि हमारी बिरादरी का है तो भ्रष्टाचारी हो ही नहीं सकता और गैर बिरादरी का है तो हम ईमानदार कह नहीं सकते? तरसते रहें माणिक सरकार, अरविन्द केजरीवाल, मनोहर पर्रिकर दो चार ईमानदार समर्थकों की तलाश में?? गंगा में पानी नहीं है लेकिन कुंभ लगेगा, लाखों करोड़ों लुटाये जायेंगे, सवाल करेंगे तो हम संस्कृति विरोधी करार दिये जायेंगे। सड़क पर नमाज अता करने से यदि अल्लाह कहीं होंगे तो उनको नाराज होना ही चाहिए। लेकिन अल्लाह खुश और भगवान नाराज?? उसी तरह से बीच सड़क पर घेरकर मंदिर बना दिया जाय, आने जाने वाले यात्री टकरा के मर भी जायें तो इससे भगवान तो खुश और अल्लाह नाराज हो जायेंगे। संस्कृति के नाम पर हमारे नौजवानों में यही समझ विकसित की गयी है। इसी पर गर्व करें क्या ??भगवान राम के शम्बूक वध?? परशुराम के क्षत्रिय और मात्रृ वध, द्रोणाचार्य के एकलव्य अत्याचार पर, फूलन देवी, जमुना निषाद, भंवरी देवी के साथ किये गये बलात्कार पर सवाल किये नहीं कि आप को लाठी डंडे लेकर समाज से बहिष्कृत कर देने की कवायद शुरु हो जायेगी? फिर तो आपके यहाँ न चार्वाक पैदा होंगे, न जरथुस्त्र, न राहुल सांकृत्यायन, न अंबेडकर, न मार्क्स, न तस्लीमा नसरीन, न मलाला, न मुंशी प्रेमचंद, न गोर्की और शेटेनिक वर्सेज के लेखक सलमान रूश्दी??  जो भारत के नागरिकों को मंत्र पढवाकर हर समस्या का समाधान निकालेंगे। ताबिज देकर कहेंगे, इसी पर बैठ जाइये और चुनाव जीत जाइयेगा। हमें अपनी नश्लों को जिंदगी की  सच्चाईयों से आँख मिलाकर बात करने का हुनर सीखाना पड़ेगा। तभी हम भारत देश का भला कर पायेंगे।