वीर शहीद अखिलेश निषाद की कुर्बानी बेकार नही जाने दूँगा-डाo संजय कुमार निषाद

गोरखपुर (Gorakhpur), एकलव्य मानव संदेश (Eklvavya Manav Sandesh), ब्यूरो रिपोर्ट, 28 मई 2018। 07 जून 2018 को मछुआ (निषाद कश्यप) के आरक्षण के लिए होगा उत्तर प्रदेश बंद। पहले 07 जून 2015 व 2016 - 2017 और अब 07 जून 2018 को फिर सुलगेगी मछुआ समुदाय के एससी आरक्षण की आग।
    जो मछुआ(कश्यप-निषाद) समुदाय की 17 जातियों के SC आरक्षण की लड़ाई में वीर शहीद अखिलेश निषाद ने अपनी कुर्बानी देकर बिगुल फूंका था, उस वीर शहीद अखिलेश निषाद की कुर्बानी बेकार नही जाने दूँगा-डाo संजय कुमार निषाद (राष्ट्रीय अध्यक्ष निषाद पार्टी)
     कौन था वो अखिलेश, जो निषाद आरक्षण की लड़ाई में मारा गया…??
 7 जून 2015 को बीएससी तृतीय वर्ष का छात्र था अखिलेश सिंह निषाद। आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष में इटावा रहने वाले के बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र अखिलेश कुमार निषाद की गोली लगने से मौत हो गई थी और उसी के गांव का गणेश सिंह निषाद घायल हो गया था। अखिलेश के पेट में गोली लगने से पुलिस द्वारा हवाई फायरिंग किए जाने पर सवाल खड़े हो गए थे। मेडिकल कॉलेज पहुंचे अखिलेश के साथियों ने बताया कि एक अफसर के बगल में खड़े पुलिस वाले ने पिस्टल से अखिलेश पर गोली चलाई थी। 
          आरक्षण की मांग कर रहे निषाद समुदाय के लोगों को 7 जून 2015 (रविवार) को मगहर में रेलवे ट्रैक से हटाने के दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच संघर्ष हो गया था। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठी चार्ज कर दिया था। इस दौरान इटावा के अखिलेश कुमार निषाद और गणेश सिंह निषाद को गोली लग गई थी। जिसमें अखिलेश की मौत हो गई। जबकि गणेश दाहिनी आंख के नीचे गोली लगने से घायल हो गया। माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी था अखिलेश अधिकारियों ने पुलिस द्वारा हवाई फायरिंग किए जाने की बात कहते हुए अखिलेश को गोली लगने की घटना को जांच का विषय बताया था। सोमवार 8 जून 2015 को मेडिकल कॉलेज पहुंचे अखिलेश के साथ प्रदर्शन में शामिल युवकों ने आरोप लगाया कि एक अफसर के बगल में खड़े वर्दीधारी ने पिस्टल से गोलियां चलाई थी। जिसकी एक गोली अखिलेश को और एक गणेश को लगी थी। आरक्षण की मांग को लेकर रेलवे ट्रैक जाम करने के दौरान मारा गया अखिलेश माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी था। होनहार अखिलेश ने अपनी पढ़ाई के साथ गांव में स्कूल भी खोल रखा था और गांव के अन्य बच्चों को पढ़ाता था। 
      उसकी वह हंसी हमेशा याद रहेगी
अखिलेश इटावा के बकेवर क्षेत्र के मड़िया दिलीप नगर निवासी आत्माराम निषाद का इकलौता बेटा था। अखिलेश की बड़ी बहन रंजना की शादी हो गई है। जबकि संध्या और वंदना दो छोटी बहनें हैं। राज बहादुर डिग्री कॉलेज लखना इटावा से बीएससी तृतीय वर्ष की पढ़ाई कर रहे अखिलेश ने गांव में वीर एकलव्य विद्या मंदिर के नाम से स्कूल खोल रखा था। गांव के 14 लोगों के साथ आंदोलन में शामिल होने के लिए छह जून की शाम गोरखपुर के निकला था। इटावा से गोमती एक्सप्रेस से सभी 14 लोग लखनऊ पहुंचे और वहां से बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में सवार होकर सात जून 2015 की सुबह गोरखपुर पहुंचे। गोरखपुर से गोंडा पैसेंजर ट्रेन से ये लोग मगहर पहुंचे थे। अखिलेश की मौत की खबर ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है। पूरे परिवार में अखिलेश सबसे होनहार था। गोरखपुर आते समय हंसते हुए मिला था। उसकी वह हंसी हमेशा याद रहेगी।

हाथी घोड़ा पालकी 
जय निषाद के लाल की

उत्तर प्रदेश में आने वाले दिनों में यह नारा आपको सुनाई पड़ सकता है। निषादों की राजनितिक चेतना को दर्शाता यह नारा ढाई करोड़ निषाद समाज की एकजुटता का प्रतीक का भी प्रतीक है। निषाद समुदाय समाजिक न्याय को स्पष्ट तरीके से लागू करने के लिए निषाद जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने के मांग पिछले 2.5 दशक से कर रहा है। निषाद समाज का कहना हैं की जब राज्य की व्यवस्था में ट्रांसफर पोस्टिंग आपके काम की जह आपके नाम के पीछे लगे उपनाम को लेकर दी जाती हो, ऐसे में समाज का उचित प्रतिनिधित्व ना राजनीति और ना ही ब्युरोक्रेसी होने की वजह से समाज का काम नहीं होता। जबकि आप उत्तर प्रदेश में दलित आईएएस लाबी और एक दो पिछड़ी जाति के अधिकारी अब अच्छी पोस्टिंग के साथ पाते हैं। समाजिक न्याय की पुनर्विवेचना कोई भी राजनितिक दल नहीं करना चाहता है। जिसकी वजह से अति पिछड़ी जातियों व दलित कुछ जातियों में समाजिक न्याय का फायदा नहीं पहुँच पाया है। 
         स्पष्ट रूप से देखा जाय तो उत्तर प्रदेश में पश्चिम भाग के जाटव अनुसूचित जाति कोटे में और यादव व कुर्मी पिछड़े कोटे में सर्वाधिक फायदे में रहे हैं। इन्ही जातियों की राजनितिक चेतना वाली पार्टियों ने पिछले तीन दशकों में प्रदेश में राज भी किया है। कुछ जातियों का समाजिक न्याय की प्रक्रिया पर पूरी तरह से काबिज हो जाने की वजह से हजारों अन्य जातियों में असंतोष हैं और उसकी ही परिणिति ताजा निषाद आन्दोलन है। गुर्जरों के सफल आरक्षण आंदोलन के बाद अब निषाद समाज के लोगों ने भी आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया था। 7 जून 2015 को अपनी मांगों को लेकर समाज के लोगों ने गोरखपुर-लखनऊ रेलवे लाइन पर बैठकर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस दौरान मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मियों और आंदोलन कर रहे लोगों के बीच झड़प हो गई। जिसमें प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच पथराव-फायरिंग में एक युवक की मौत हो गयी। वहीं, प्रदर्शनकारियों ने आगजनी कर कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया। इस पूरे घटना क्रम में रेलवे को कई ट्रेनों के रूट बदलने पड़े तो कई गाड़ियों को टर्मिनेट भी करना पड़ा था। 
       अनुपातिक आरक्षण के मुद्दे पर बहुजनवादियों की चुप्पी की वजह से निषाद समाज सकते में है। वे पूछ रहें है की क्या निषादों को अम्बेडकरी-पेरियारी सामाजिक राजनीतिक आंदोलन से बाहर माना जाय ?? मुद्दा छोटा सा है। यह समुदाय दिल्ली, महाराष्ट्र व उड़ीसा की तरह उत्तर प्रदेश में भी निषादों को एससी लिस्ट में लाना चाहता है। जबकि दलित इसका विरोध करते हैं। सपा से मुख्यमन्त्री बने मुलायम सिंह को यह राजनीतिक मुद्दा लगा, जिससे मायावती परेशान हो सकती थीं, तो उन्होंने अपनी सरकार में सन 2005 में निषादों को एससी लिस्ट में शामिल कर दिया। साथ ही पार्टी में प्रमुख पद पर निषाद नेता को प्रमोट कर दिया था। 
     मछुआ समुदाय की अनुसूचित जातियों में गोंड, तुरैहा, मझवार, खरबार, बेलदार की भाँति इस समुदाय की अन्य जातियों जिनमें कहार, कश्यप, निषाद, मल्लाह, केवट, बाथम, धीवर, धीमर , बिन्द , माझी , गोड़िया , तुरहा, रायकवार, मेहरा तथा मछुआ को भैयाराम मुंडा बनाम अनिरुद्ध पटार केस AIR 1971 के आलोक में एवं उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा समाज कल्याण विभाग के अनुसूचित जाति /जनजाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान लखनऊ के माध्यम से 2003, 2006, 2007 तथा 2013 में व्यापक मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण की संस्तुतियों के आधार पर इन जातियों को संविधान संशोधन कराकर धारा 341 (1 ) में जोड़ने के लिए प्रयास किये हैं।
     आरक्षण की मांग जायज है की नहीं इसके पीछे की परिस्थिति भी देखनी होगी। निषाद समाज नदी पर आश्रित रहने वाला समाज है। नदी में नाव चलाना, मछली पकड़ना, रेत बेचना आदि इनका पारम्परिक व्यवसाय था। आधुनिक भारत में पुलों के निर्माण से नौका का काम बन्द हो गया, इंडस्ट्री की वजह से नदियों के जल में प्रदूषण है, सो मछली भी नही हैं। रेत खनन में सरकारी दबदबा है। ऐसे में भूमिहीन निषाद के लिए समय बड़ा प्रतिकूल है। मायावती सरकार के हस्तक्षेप से मछुआ समुदाय के पैतृक कामधंधों (Customary Right) जैसे मत्स्य पालन, बालू खनन, नाव घाट ठेका को भी इस समाज से छीन कर नीलामी के अंतर्गत ले आया गया। ऐसे में इनको सरकारी नौकरियों में आरक्षण अनुसूचित जाती के अंतर्गत देने की मांग उचित लगती हैं। 
      प्रदेश के 19 जिलों में मल्लाह जाति विमुक्त जाति घोषित है तथा मछुआ समाज की गोंड, तुरैहा, खरबार, मंझवार और बेलदार जातियाँ उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जातियों की लिस्ट में हैं। अब समाज अपनी 17 अन्य जातियों को अनुसूचित जाति की लिस्ट में देखना चाहता है। जल जंगल और जमीन पर आश्रित इन मछुआ जातियों को बदलते विकास के दौर ने कहीं अधिक पीछे धकेल दिया है। जिस कारण इन जातियों को सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक मोर्चे पर उपेक्षा और शून्य के दौर से उबरने के लिए संविधान सम्मत अधिकारों और सुविधाओं के लिए संविधान में अनुमन्य आरक्षित व्यवस्था से सम्बद्ध होना आवश्यक है ।