1857 की क्रांति में दलितों का योगदान किसी से कम नहीं

अलीगढ़ (Aligarh), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) के लिये बालक राम साँसी की रिपोर्ट, 18 जून 2018। 1857 की क्रांति में दलितों का योगदान किसी से कम नहीं था। दलित पक्ष के योगदान की गुत्थी अब काफी हद तक सुलझ चुकी है। हाशिया बनाया गया पक्ष विस्तृत हो चला है। इतिहास पुनर्लेखन की चर्चा जोर पकड़ रही है। इस सम्बन्ध में विनय ठाकुर ने दलितों का क्रांति में योगदान के विषय में लिखा है कि दिल्ली की जंग-ए-आजादी में बलिदान देने वाले लोगो में बहुत मामूली लोग थे, जिन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया। भिश्ती, सांसी, गुजर, कहार, मल्लाह, भान्तु जैसे 193 जातियां आदि शामिल थी।
     सती चौरा कांड में निषादों ने 1856 में योजनाबद्ध तरीके से 3500 अंग्रेजो को गंगा में डुबोकर मौत के घाट उतरा था। इनकी बस्तियों को आग लगा दी गयी। कानपुर के इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो ज्ञात होता है कि 27 जून 1857 को सुबह 6 बजे 167 निषादों को सती चौरा घाट पर बरगद के पेड़ से लटका कर कची फाँसी दे दी गयी और तोपों से उनके मृत शरीर के चीथड़े उड़ा दिये गए। 31 मई 1860 को क्रांतिकारी बुद्ध चौधरी, लोचन मल्लाह , समाधान निषाद , बिर्गेडियर ज्वाला प्रसाद जिसके उपरांत न जाने कितने मल्लाह तो अंग्रेज गोलियों का शिकार हुए ही फिर लगा 1871 में क्रिमिनल ट्राइबस एक्ट। 82 साल क्रिमिनल ट्राइब लगाने के बाद इन बहादुर जातियों की स्थिति बद से बतर हो गई। आज़ादी के आज 68 साल बाद भी किसी सरकारों ने इनके विकाश के लिए कुछ नहीं सोचा। आयोग पर आयोग बने और चले गए। आज भी लोग अशिक्षित , बेरोजगार, बेपहचान, बेघर, बेजर, बेपर और राजनीती से कोशों दूर हैं। इनको जरूरत है शिक्षा की। बोर्डिंग स्कूल हो, अलग से बजट हो, अलग से आरक्षण हो, लोगों को रहने के लिए घर हो, श्मशान के लिए जगह हो। एसी एस्टी की तरह एक आयोग हो, जिसमें अपने समाज की मुस्कलात बता सकें और राजनीती में भागीदारी हो। भारत सरकार इनको स्वतंत्रता सेनानी के वंशज घोषित करे।