भाजपा के मिशन 2019 को सबसे बड़ा झटका देगी निषाद पार्टी

 
अलीगढ़ (Aligarh), एकलव्य मानव संदेश ( Eklavya Manav Sandesh) ब्यूरो रिपोर्ट, 22 जून 2018। निषाद आरक्षण के लिये संघठित आंदोलन से उभरी निषाद पार्टी पूर्वांचल के साथ पूरे उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश व अन्य प्रदेशों में भी बीजेपी के वोटबैंक को खिसका रही। निषाद पार्टी का यह कारनामा भाजपा के मिशन 2019 को लग बड़ा झटका देने की तैयारी में है निषाद पार्टी।


भाजपा इस बार छोटे दलों के बनते-बिगड़ते समीकरण से परेशान है। पूर्वांचल में बीजेपी को आने वाले लोकसभा चुनाव 2019 में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

2017 के विधानसभा चुनाव में विरोधी दलों को जबर्दस्त तरीके से पछाड़ने वाली बीजेपी इस बार छोटे दलों के बनते-बिगड़ते समीकरण से परेशान है। पूर्वांचल में बीजेपी को इस लोकसभा चुनाव में इन दलों से काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। विधानसभा चुनाव व लोकसभा उपचुनाव में गठबंधन का आगाज कर दमदार उपस्थिति दर्ज कराने वाला गोरखपुर से उभरा एक ऐसा ही दल इन दिनों बीजेपी के वोटबैंक को भी खिसकाने में लगा है। कभी निषाद मतों के बल पर कई सीटों पर काबिज होने वाली बीजेपी के लिए निषाद पार्टी का मजबूत होना उसके मिशन 2019 को झटका साबित हो सकता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

इस तरह पड़ी निषाद पार्टी की नींव- डाॅ.संजय कुमार निषाद गोरखपुर के रहने वाले हैं और निषाद पार्टी (स्थापना 16 अगस्त 2016) व राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वह तब चर्चा में आए जब उन्होंने निषाद वंशीय समुदाय को अनुसूचित जाति में शामिल कर आरक्षण देने की मांग को लेकर कसरवल में आंदोलन शुरू किया गया था। जाट आंदोलनकारियों की तर्ज पर सैकड़ों की संख्या में आंदोलनकारियों ने रेल ट्रैक जाम कर दिया था। आंदोलनकारियों का प्रशासन से टकराव हुआ जिसमें पुलिस फायरिंग में इटावा के यमुना किनारे स्थित मंडियां दिलीप नगर से चलकर आया एक नौजवान अखिलेश निषाद मारा गया था।
 2015 में हुए इस आंदोलन में डाॅ.संजय सहित तीन दर्जन साथियों को जेल जाना पड़ा। जेल से छूटने के बाद उन्होंने निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद पार्टी) नाम से पार्टी बनाई। घूम घूमकर सजातीय लोगों को जोड़ा। एकजुट करने के बाद विधानसभा चुनाव 2017 में पीस पार्टी के साथ गठबंधन किया और चुनाव लड़ा।

निषाद जाति का गोरखपुर क्षेत्र की कई सीटों पर है खासा प्रभाव। गोरखपुर मंडल की राजनीति में निषाद जाति के वोटरों का अच्छा खासा प्रभाव रहा है। गोरखपुर जिले में यह जाति जीत-हार की निर्णायक भूमिका में रहती है। हालांकि, आस्था के केंद्र गोरखनाथ मंदिर से इस जाति का विशेष लगाव रहा है। गोरखनाथ मंदिर के गुरु मच्छेंद्रनाथ को यह समुदाय अपना देवता मानता है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो गोरखनाथ मंदिर से विशेष श्रद्धा होने की वजह से मंदिर से ये लोग खुद को अलग नहीं मानते। हालांकि, बदलते राजनीतिक परिदृश्य में मछुआरा समाज इस बार डाॅ.संजय निषाद की पार्टी निषाद दल के साथ एकजुट हो गया है
इसका असर यह हुआ कि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन होने और बसपा के समर्थन देने से दलितों और पिछड़ों का वोट एकमुश्त सपा प्रत्याशी ईं. प्रवीण कुमार निषाद सुपुत्र डॉ. संजय कुमार निषाद को मिल गया। इस नए समीकरण ने प्रदेश की राजनीति में धमाल मचाते हुए उपचुनाव में सपा को बहुप्रतिक्षित जीत दिलाई। इस जीत से बुलंद हौसले के साथ गठबंधन ने कैराना और नूरपुर उपचुनाव भी छोटे दलों के भरोसे जीत कर मिशन 2019 में बीजेपी की मुश्किलें खड़ी करने का संकेत भी दे दिया है।

उत्तर प्रदेश में निषाद वंश की आबादी करीब 17 फीसदी है। इस समुदाय की सात पर्यायवाची जातियां-मंझवार, गौड़, तुरहा, खरोट, खरवार, बेलदार, कोल अनुसूचित जाति में शामिल हैं। जबकि निषाद समाज की अन्य उपजातियों को ओबीसी में रखा गया है। इस समाज के अगुवा लोगों का मानना है कि निषाद वंशीय समाज की सभी जातियां अनुसूचित जाति में शामिल हों। इसके लिए यह समाज आंदोलित भी है।
यह समीकरण परेशान कर सकता है बीजेपी को। राजनीतिक मानते हैं कि समाजवादी पार्टी के पास यादव व मुसलमान का बेस वोट बैंक है। बसपा के पास दलितों का बेस वोट है। छोटे दलों जैसे निषाद पार्टी व पीस पार्टी का भी 150 से अधिक सीटों पर प्रभाव है। ऐसे में इन दलों के गठबंधन का असर यह होगा कि विधानसभा की सौ से अधिक सीटों पर एकतरफा प्रभाव डाल सकते हैं।
जानकारों की मानें तो यूपी की 80 लोकसभा सीटों में 25 सीट पर मछुआ समाज का वोट 3.5 लाख से ऊपर है। जबकि 20 सीट पर ढाई लाख से ऊपर और 15 सीटों पर एक से दो लाख के आसपास वोट है। लेकिन राजनैतिक रूप से यह समाज किसी अन्य दल की बजाय बीजेपी के अधिक नजदीक हुआ करता था। लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं। मंदिर के करीबी रहे जमुना निषाद ने ताल ठोक कराया था ताकत का अहसास।
 नब्बे की दशक की बात है जब गोरखनाथ पीठ के ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ के करीबी माने जाने वाले जमुना निषाद ने गोरखनाथ मंदिर के तत्कालीन उत्तराधिकारी और सूबे के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ लोकसभा चुनाव में ताल ठोक दी। यह लड़ाई काफी बेजोड़ थी। परिणाम भी काफी नजदीकी निकला। सपा के सिंबल पर ताल ठोकने वाले जमुना निषाद ने 1999 के लोकसभा चुनाव में 260043 वोट बटोरे। जबकि चुनाव जीतने वाले योगी आदित्यनाथ को 267382 मत मिले। यानी महज 7339 वोटों का अंतर रहा योगी आदित्यनाथ की जीत का।
 इस हार के बाद भी निषाद समाज खुद को जीता हुआ महसूस किया। इस चुनाव ने उनके अंदर राजनैतिक चेतना भरने का काम किया और राजनैतिक हैसियत का भी अंदाजा लगा। हालांकि, जमुना निषाद की आसमयिक मौत के बाद दूसरे किसी भी निषाद समाज के नेता ने चुनावी अंकगणित में सफलता नहीं हासिल की। खुद जमुना निषाद की पत्नी भी लोकसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के खिलाफ लड़ी लेकिन जीत हार का अंतर काफी बड़ा था।
परंतु पिछले कुछ सालों से निषाद समाज केलिए काम कर रहे डाॅ.संजय निषाद की अगुवाई में यह समाज एकजुट होता दिख रहा। अब परिवर्तन की बारी है, निषाद राज की बारी है यह मूल मंत्र निषाद वंशीय सभी जातियों को एकजुटता में बांध कर डॉ. संजय कुमार निषाद के कुशल नेतृत्व में अपनी मंजिल को फतह करने के लिए तैयार हो रहा है। और इसी मंत्र ने 2019 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनाने के मंसूबों को कमजोर कर दिया है।

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