मोदी और योगी की भाजपा सरकार उत्तर प्रदेश में लागू आरक्षण शासनादेश को क्यों नहीं कर रही हैं लागू ???

अलीगढ़ (Aligarh), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) , एडिटोरियल रिपोर्ट, 6 जून 2018। मोदी और योगी की भाजपा सरकार आज भी उत्तर प्रदेश में लागू आरक्षण शासनादेश को क्यों नहीं कर रही हैं लागू ???
 पिछली सपा की अखिलेश यादव सरकार ने जाते जाते 17 जातियों को इनकी मूल जाती में परिभाषित करते हुए अनुसूचित जाति की मान्यता स्पष्ट शासनादेश के माध्यम से (शासनादेश की प्रतिलिपि लेख के साथ संलग्न है) दी थी। इससे पहले 7 जून 2015 को गोरखपुर की सीमा पर मगर में राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद ने रेल रोको आंदोलन किया था। इस रेल रोको आंदोलन में इटावा के आंदोलनकारी अखिलेश निषाद की मौत हो गई थी। इसके बाद आंदोलन व धरना जिलाधिकारी कार्यालय गोरखपुर के बाहर किया गया था। इसी धरने को 8 जून को संबोधित करते हुए तत्कालीन गोरखपुर सांसद योगी आदित्यनाथ जी ने कहा था कि निषादों को स्थिति बहुत ही दयनीय है और ये अनुसूचित जाति के आरक्षण के हक़दार हैं। हमारी सरकार बनी तो इनको अनुसूचित जाति का आरक्षण दिलाया जाएगा। योगी जी इससे पहले भी लोकसभा में निषाद आरक्षण की बकालत कर चुके थे। इससे पहले मोदी जी ने भी अपनी वाराणसी की चुनावी सभा में निषादों को उनके हक अधिकार देने की बात कही थी। भाजपा की 2014 में मोदी जी के नेतृत्व में सरकार बनी तो इसी सरकार की निषाद वंस की राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने भी निषाद वंशियों को आरक्षण देने की बात कही थी। पिछले दिनों समाचार पत्रों में कैराना चुनाव से पहले भाजपा ने यह संदेश छप वाया की वह निषाद कश्यप की जातियों को आरक्षण देने जा रही है। इन सबके बाद भी आज तक भाजपा की केंद्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ जी की सरकार ने आज तक एक भी कदम इस समाज के आरक्षण को लागू करने के लिए नहीं उठाया है। इसका मतलब यह है कि आज भी भाजपा में केवल 
जुमलेवाज़ी ही है। 
निषाद कोई भीख नहीं मांग रहे हैं। निषाद अपने हक़ को मांग रहे हैं। इनके धनोपार्जन के साधनों पर केंद्र और राज्यों की सरकार का कब्जा है, चाहे नौकायन हो, बालू खनन हो, मत्स्य आखेट हो या जंगल से आय प्राप्त करने की बात हो। इनके साधन छीन जाने से 90 प्रतिशत परिवार गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर हैं। इनकी 80 प्रतिशत आवादी आज भी नदी, नालों, तालाबों के किनारे रहकर अविकसित इलाको में रहते हैं। आज उत्तर प्रदेश में लगभग 2.6 करोड़ आवादी वाले समाज में आईएसएस, आईपीएस, पीसीएस अधिकारी और एमबीबीएस डॉक्टर उंगलियों पर गिनने की संख्या में है। 80 प्रतिशत परिवारों में अशिक्षा है। इनकी को दिल्ली, बंगाल, उड़ीसा में आज भी आरक्षण है। उत्तर प्रदेश में मझवार, तुरैहा, गोंड का आरक्षण मिला हुआ है। केवल परिभाषित आरक्षण को लागू करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को कदम बढ़ाना है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 27 मार्च को इनके प्रमाण पत्रों पर लगी रोक हटा दी थी। लेकिन भाजपा की सरकार अपने वायदे को पूरा करने के लिए तैयार नहीं है। 
राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद का जन्म ही महामना डॉ. संजय कुमार निषाद जी के द्वारा गोरखपुर में इस आरक्षण के लिए ही लिया था। खुद 1 माह जेल भी जा चुके हैं। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक जोरदार आंदोलन भी कर चुके हैं। कई बार तहसील से लेकर जिला मुख्यालय और राजधानी दिल्ली, लखनऊ तक ज्ञापन सौंपे गए हैं। लेकिन भाजपा अपना वायदा पूरा करने से अभी तक दूर ही रही है। अगर अब भाजपा की सरकार ने इस जाति के आरक्षण को लागू करने में देर की तो 2019 के चुनाव में भारी नुकसान उत्तर प्रदेश के साथ अन्य राज्यों में भी उठाना पड़ेगा। 9 प्रतिशत आवादी वाला मछुआ समुदाय अब डॉ. संजय कुमार निषाद के कुशल नेतृत्व में जाग्रत हो रहा है। पहले गोरखपुर और फूलपुर और अब कैराना और नूरपुर के उपचुनाव में अपनी शक्ति की परीक्षा दे चुका है। भाजपा अगर अपनी सरकार बनाने का ख्वाब 2019 के लिए देख रही है तो यह उसे एक भ्रम ही पैदा करेगा, उसने इन जातियों को उनके आरक्षण को लागू नहीं किया तो। 
निषाद वंशीय जातियों की आरक्षण की ज्वाला अब जोर पकड़ती जा रही है। अब यह पूरे उत्तर प्रदेश में फैल चुकी है। 7 जून 2018 को पहली बार अनेकों जगह रेल और सड़क जाम करने के लिए तैयारी की गई हैं। जो आने वाले दिनों में और व्यापक रूप धारण करने के लिए तैयार हो सकता है।