क्यों पहुंचो 25 जुलाई को गोरखपुर में महा संग्राम दिवस मनाने ??

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश (Gorakhpur, Eklavya Manav Sandesh), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) ब्यूरो रिपोर्ट, 24 2018। क्यों पहुंचो 25 जुलाई को गोरखपुर में महा संग्राम दिवस मनाने ?? यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन पहले हमको उस निषाद वंस की महान शेरनी के बारे में जानना जरूरी है, जो जाति और मर्द की सत्ता को को खुद एक चुनौती थीं। फूलन देवी एक ऐसा नाम है, जिसे दुनिया के वंचितों के साथ बहुजन आबादी ने सराहा है। इतना ही नहीं, इनकी गौरव गाथा को सलाम भी किया है। पूरी दुनिया के इतिहास में फूलन देवी को लौह महिला के रूप में देखा जा गया है। फूलन देवी की विद्रोही तेवर को दुनिया ने सराहा है। तभी तो दुनिया के नामचीन पत्रिका “टाइम्स” ने फूलन देवी को दुनिया के सबसे विद्रोही महिलाओं की सूची में सर्वोच्च स्थान से नवाजा है। जिस समय फूलन से अपना विद्रोह किया, उस समय का समाज तब से लेकर आज तक का समाज भी पुरुष प्रधान ही है। ऐसे में एक निषाद की मल्लाह जाति परिवार में जन्मी इस महिला ने एक बड़ी विद्रोही सेना बनाकर पूंजीवाद, सामंतवाद, ठाकुरशाही एवं परूष प्रधान को चूर- चूर कर, वीरांगाना होने का गौरव भी हासिल किया। यह भारतीय ही नहीं अपितु पूरी दुनिया के लिए गौरव गाथा है। इसके सामने अन्य विद्रोह सब फीके नजर आते हैं। आज भी फूलन देवी वंचितों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, महिलाओं के के लिए संघर्ष, वीरता, शक्ति एवं साहस की नायाब मिशाल हैं।
      फूलनदेवी की कहानी आज भी चंबल, के साथ बीहड़ों गांवों में सुनाई जाती है और आगे भी सुनाई जाएगी। सचमुच यह रियल घटना रील के पात्र जैसी लगती है। जिसके जिस्म को हैवानियत से भरे सामंतवादीयों ने रौंदा हो, ऐसी अनपढ़, गंवार, महिला द्वारा हजारों – हजार लड़ाकू तैयार कर, पुरुषसत्व की हैवानित से भरे बाहुबलियों को धूल चटाकर समांतवाद, सवर्णवादी मानसिकता को पूर्ण रूप से ख़त्म कर देना, सचमुच साहस और आत्मबल को दर्शाता है।
      वास्तव में फूलन देवी पूरे बहुजन दलित, आदिवासी एवं महिलाओं के लिए गौरव, वीरांगना के साथ राष्ट्रमाता हैं। जिसके नाम लेने से रोम-रोम में ऊर्जा का गजब का संचार होता है, आत्मबल चौगुना बड़ जाता है। फूलन देवी से आज निषाद, मल्लाह समुदाय ही नहीं दलित, आदिवासी, बहुजन भारत प्रेरणा ले रहा है। साथ ही इसके अपने समुदाय के लोग समाज की देवी और नायिका के रूप में मानने लगे हैं। वैसे तो इस महान वीरांगना को प्राथमिक पाठशाला से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में इसके गौरवगाथा को शामिल कर अध्ययन कराने की जरूरत है। इसी के साथ ही विश्वविद्यालय स्तर पर शोधकार्य भी होनी चाहिए। इस विभूति के नाम पर अंतरराष्ट्रीय महिला शोध केंद्र या विश्वविद्यालय फूलन देवी के नाम से अनिवार्य रूप से भारत सरकार को खोलने की आवश्यकता है। फूलन देवी की गौरव गाथा को नीचे बिंदुवार रेखांकित करके आगे विमर्श करेंगे-
-वैश्विक धरोहर के रूप में – फूलन ने जिस जगह, परिवरिश, जद्दोजहद, शोषण, अनाचार सहते हुए साहस, वीरता, विद्रोहपन का नायाब उदाहरण पूरे भारतीय समाज के सामने पेश किया है। यह सचमुच राष्ट्रीय धरोहर है। ऐसी ही रत्नों से भारत का नाम पूरी दुनिया में गुंजायमान होगा।          
       सचमुच,वंचितों, दलितों, आदिवासियों, बहुजनों आन- बान एवं शान है। अद्भुत पराक्रम का उदाहरण है, ऐसे उदाहरणों से देश के लोग टूटेंगे नहीं बल्कि मजबूती से जुड़ेंगे।
-दलित, आदिवासी, बहुजन समाज की चीत्कार है। फूलन–बहुजन समुदाय में जन्मी इस महान वीरांगना की चीत्कार से पूरा का पूरा वंचित तबका साहस का ऊर्जा भरता है। फूलन वीरता, साहस, संघर्ष बलिदान का नाम है। इस नाम के सामने भारतीय ही नही अपितु दुनिया के इतिहास में दूसरा कोई अन्य सख्स फीका पड़ जाता है। अपने युद्ध कौशल और वीरता की गहरी छाप फूलन ने छोड़ रखी है। इनके बनाए वीरता के इतिहास से सभी दलित, आदिवासी, बहुजन भारत के लोग बार-बार प्रेरणा लेकर निरंतर आगे बढ़ते रहेंगे।
-सवर्णवाद – सामंतवाद पर गहरी चोट- आर्यों के आगमन से पूर्व के समय, बुद्धकाल, अशोक कालीन भारत के आलवा भारतीय वयवस्था सवर्णों के गुलाम ही रही है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में यहाँ का शासन राजपूतों के हाथों में रहा है। यही सामंतवादी, जातिवादी पुरुष प्रधान, समाज को उखाड़ने का बीड़ा एक मल्लाह कुल में जन्मी इस दस्यु वीरांगना ने लिया। इतना ही नहीं, इन्होंने उस पूरी की पूरी व्यवस्था को कई बार नष्ट कर इनके गुरूर को भी राख़ में तब्दील किया।
-दुनिया की सबसे विद्रोही महिला में शुमार- सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका टाईम्स, द्वारा किए गए सर्वे में, फूलन देवी को दुनिया के सबसे विद्रोही महिला की सूची में शुमार करते हुए, चौथे स्थान पर रखा गया है। इस सर्वे में दुनियाभर से सेंपल साइज लिया गया था। इस तरह से फूलन के विद्रोहीपन का डंका भारत ही नहीं, अपितु पूरी दुनिया में बजने लगा है। कोई इसे वीरांगना, कोई दस्यु सुंदरी, कोई विद्रोहिनी फूलन के नाम से पुकारते हैं। इस तरह से फूलन ने अपने विद्रोही तेवर से भारत का गौरव बढ़ाया है। जबकि भारतीय समाज पुरुष प्रधान के साथ ही, सामंतों का गुलाम समाज रहा है।
-हिंदी सिने जगत में स्थान- भारतीय इतिहास में बहुत कम ऐसे शख्स हैं जिनके जीवन पर आधारित फिल्में बनाई गई हों, उनमें भी महिलाओं की जीवनी पर आधारित फिल्म। हिंदी सहित अन्य भाषाओं में भी फिल्में नहीं बन पायी हैं। बात तब रोचक हो जाती है जब कोई शूद्र समाज में जन्मी फूलन की बात होती है। इस पर फिल्म बनना पूरे शूद्र बिरादरी के लिए बड़े सम्मान की बात है। वैसे जो कार्य फूलन ने किए है वह सचमुच इस पर लेखन, फिल्मांकन, गोष्टी, करने कि सचमुच जरूरत है। जाने – माने फ़िल्मकार, निर्देशक शेखर कपूर ने फूलन देवी के जीवनी पर आधारित बहुत ही चर्चित एवं सफल फिल्म बनायी जिसका नाम है ‘बैंडिट क्वीन’। हालांकि इस फिल्म को लेकर खुद फूलन देवी ने आपत्ति दर्ज कराई थी, काफी दिनों तक फिल्म को बैन भी कर दिया गया था। इसके बावजूद आज भी लोग फूलन की वीरता एवं पराक्रम को देखने के साथ ही किसी महिला के साथ हुए जुल्म एवं अमानवीयता को फिल्म में देखने का साहस लोग भी बड़ी मुश्किल से कर पाते हैं। इस तरह से फूलन को रीयल से लेकर रील तक काम हुआ।
-दस्यु सुंदरी का सामाजिक खिताब- भारतीय इतिहास आर्य और अनार्य संघर्ष का रहा है। यहाँ के अनार्य, मूलनिवासियों को दस्यु, राक्षस, दानव, असुर आदि नामों से संबोधित किया गया है। यहाँ के मूलनिवासी राजा- महाराजाओं को असुर, दस्यु सम्राट आदि नामों से संबोधित किया गया है और रानी, राजकुमारी को भी दस्यु सुंदरी, असुर सुंदरी आदि नामों से सामाजिक संबोधन होता रहा है। ब्राहमणवादी साहित्य, लेखकों ने अनार्य कालीन, मूलनिवासी शब्दों को नकारात्मक रूप के साथ भद्दी गाली के रूप में परोसने का भी कार्य बहुत ही धूर्तता के साथ किया गया। उसी आधार पर सभी भारतीयों का दृष्टिकोण भी बना। एक तरह से कहा जा सकता है कि भारतीय नजरिया ब्राह्मणवादी बनाया गया। फिर बार- बार मूलनिवासी पराक्रमी राजा, महाराजा यहाँ जो भी पराक्रमी या बुद्धजीवी हुए उसे समाज के खलनायक के रूप में पेश किया गया। इतना ही नहीं इन सबको कुकर्मी, अपराधी, अपवित्र भी घोषित किया गया। इसके लिए साहित्य लेखन कर नामों का अपवित्रीकरण किया गया। जिसका दंश आज तक हमारी पूरा का पूरा समाज झेल रहा है।
डॉ. अंबेडकर के लेखन के बाद ही आज के अंबेडकरी साहित्य के साथ ही दलित इतिहासकार, बुद्धजीवियों ने भाषा का समाजशास्त्रीय अध्ययन कर भाषा के खेल को बताया समझाया गया। समझाने के बाद अब पढ़े लिखे प्रबुद्ध चिंतकों को इतिहास, समाज, एवं भाषा का ज्ञान हो पाया है। तब जाकर समझ पाए कि अनार्य लोग ही असुर, दानव, दस्यु, राक्षस कहलाते थे। जिस पर हमें गर्व करना है। इस तरह से देखें तो फूलन विद्रोह गाथा का सौंदर्यशास्त्र दृष्टिकोण से फूलन एक महान दस्यु सुंदरी हैं। हमें फूलन को दस्यु सुंदरी के नाम से संबोधित भी करनी चाहिए, साथ ही गौरववान्वित भी करना चाहिए।
-पुरुष प्रधान समाज पर घातक प्रहार- वैसे तो पूरी दुनिया का समाज पुरुष प्रधान है, भारतीय परिदृश्य में देखे तो यह औसत और बढ़ जाता है। इस पुरुष- प्रधान समाज में रहकर तमाम तरह से शोषण को सहकर, टूटने के बजाय एक विशाल फौज तैयार कर उसका मुखिया बनकर पूंजीवाद, सामंतवाद, सवर्णवाद को मुंहतोड़ जवाब देना सचमुच पुरुषसत्ता को उखाड़ फेंखना ही है। इस तरह से फूलन देवी ने पुरुष प्रधान समाज के बीच से निकलकर पुरुष वर्चस्व को तोड़ा है। सालों से पुरुषों को अपने बाहुबल के घमंड के चलते सालों से नारियों पर शोषण आनाचार आदि करते आए हैं। ऐसे में एक महिला का उस पुरुषों के दमन और अत्याचार का खुलकर साहसिक विद्रोह करना, पुरुषों के गुरूर और घमंड को चूर- चूर करना है। ऐसे विद्रोह से ही मिथक का द्वार बंद होता है, साथ ही उम्मीद की नई किरण समाज को प्रकाशमान करती है।
-शिक्षा से ज्यादा आत्मबल जरूरी- सभी समाज में महिलाओं को शिक्षा से हजारों सालों से वंचित रखा है। ऐसे में बात आती है नारी पढ़ेगी तभी विकास गढ़ेगी, समाज में बदलाव लाएगी। यह बात सोलह आना सही है। इसके इतर मानव के लिए आत्मबल बहुत जरूरी है। फूलन देवी के ऊपर यौनिक हिंसा के साथ वह सभी तरह के शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना की शिकार हुई। इसके बावजूद वह टूटी नहीं, बल्कि और भी अधिक मजबूती से जुड़ी रहीं। अपने साथ हजारों लोगों को जोड़ कर सभी तरह से शोषण, अत्याचार का करारा जवाब इन्होंने दिया है। फूलन देवी की जीवन यात्रा पर अध्ययन करने पर पाते हैं कि शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण आत्मबल का होना है। जिस तरह से अमानवीय कृत्य फूलन के ऊपर घटा, अगर कोई दूसरी महिला के ऊपर घटता तो आत्मबल खोकर कुछ भी कर सकती थी। क्योंकि आज भी समाज में महिला के पास पुरुषों की गुलामी स्वीकारने व आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं दिखता है, चाहे आप कितना भी शिक्षा लिए हों। फूलन देवी में गज़ब का आत्मबल देखने को मिलता है, यही साहस एवं आत्मबल वंचितों के लिए संजीवनी का कार्य करता है।
-सेना नायिका के रूप में- पूरे दुनिया के इतिहास में एक सेना नायिका के रूप में महिला का होना, उनमें में सेना द्वारा खुलकर विद्रोह का बिजुल बजाना, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं लगता है। लेकिन यह कीर्तिमान स्थापित किया है, बहुजन समुदाय की इस वीरांगना ने। जिसके एक आदेश से सामंतवादी, पूंजीवादी, सवर्णवादी ताकतें थर्राती थीं। एक बहुत बड़ी सशस्त्र सेना की नायिका होने का गौरव इस बहुजन महिला को हासिल हुआ है। यह पूरे भारतीय बहुजन समाज के लिए प्रेरणा हैं।
-राजनेता के रूप में–गाँव-गरीब एवं एक शूद्र किसान परिवार से निकलकर, विद्रोह करने के बाद, सशस्त्र विद्रोह को छोड़ कर 11 बरस जेल में बिताये, इसके बाद 1996 में फूलन देवी ने समाजवादी पार्टी की टिकट पर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और रिकार्डमतों से जीत हासिल कर संसद के गलियारे में कदम रखा। इस तरह से जनता ने एक अपने नेता के रूप में हाथों हाथ लिया। वास्तव में यह वीरांगना, वीरता, हथियार के बल पर ही नहीं अपितु आम जनता के बीच सम्मानित रही हैं।
-महिलाओं की प्रेरणास्रोत- फूलन देवी पूरी दुनिया की आधी आबादी, यानि महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। ऐसी विलक्षण प्रतिभा हमें कहीं भी देखने को नहीं मिलती है। आज पूरी महिला बिरादरी, फूलन के युद्धकौशल, वीरता को सलाम करती है। जिसने अपने शोषण, अनाचार को ढाल बनाकर तपाया और खूब पिरोया, तब जाकर सवर्णों को ललकारते हुए, इनकी बनाई दीवार को एक ही बार में ढहा दिया। महिला सशक्तिकरण की नायाब मिशाल हैं फूलन।
ऐसी महान महिला की हत्या अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा सरकार के समय नई दिल्ली में संसद के सत्र के दौरान 25 जुलाई को धोखे से सहारनपुर के सेर सिंह राणा नाम के व्यक्ति ने कर दी थी। आज वही राणा, जिसे फांसी की सज़ा होनी चाहिए थी, को भाजपा सरकार में बूढ़े माँ बाप की देखभाल के नाम पर पेरोल पर छोड़ कर जगह जगह हिन्दू सम्राट के रूप में पूजा जा रहा है और गरीबों की आवाज़ की दबाया जा रहा है। निषाद वंशीय जातियों के परिभाषित आरक्षण को भाजपा सरकार लागू नहीं कर रही है। इसलिए और आज तक फूलन देवी की हत्या की सीबीआई जांच भी नहीं कराई गई है। इसलिए इस समाज को न्याय दिलाने के लिए एक विलास आयोजन की आवश्यकता है। और इसी लिए इस कार्यक्रम का नाम महा संग्राम रखा गया है। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों के भाग लेने की संभावना है। इसलिए हर जागरूक व्यक्ति को 25 जुलाई को गोरखपुर के चंपा देवी पार्क में आयोजित कार्यक्रम में जरूर पहुंच कर अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए पहुंचना चाहिए। तभी वीरांगना फूलन देवी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और अधिकारों के लिए संघर्ष को बल मिलेगा।
निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष महामना डॉ. संजय कुमार निषाद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करने पर ही भाजपा जैसी धोखे बाज़ पार्टी को सत्ता से दूर करने में आपके अधिकार भी मिल सकेंगे। 

Comments

  1. Esi virangana foolan Devi ji ko hum unake sahadat divas ke din Sat Sat naman karate h.

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