आप जिसे भी पूजते हो, उसको गंदा कर देते हो ??

अलीगढ़, उत्तर प्रदेश (Aligarh, Uttar Pradesh), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) ब्यूरो रिपोर्ट, 4 जुलाई 2018। 
आप नदियों को पूजते हो, नदी गंदी कर देते हो।
आप गाय को पूजते हो, गाय को आवारा कूड़ा , कचरा खाने को छोड़ देते हो।
आप नारी को पूजते हो और दहेज़, कन्यादान, विधवा आश्रम आदि नारकीय परम्पराओं में धकेल देते हो।
यानि आप जिसे भी पूजते हो, उसको गंदा कर देते हो।
जिन देशों में गाय को नहीं पूजते, उन देशों की गायों को देखिए, आँखें चौंध जाएंगी, हमारी गायों से ज़्यादा स्वस्थ, ज़्यादा दूध देती हैं, आवारा घूमने का प्रश्न ही नहीं।
उनकी बिना पूजी नदिया देखिए, एकदम स्वच्छ और नीला पानी जिसे आप पी भी सकते हो।
 और यहां गंदा अपने उद्गम के तुरंत बाद ही टट्टी से भरना शुरू हो जाती है।
यहां दिल्ली, मथुरा में यमुना, सड़ांध मारते गंदे, गूँ मूत से भरे नाले की मानिंद है।
और नारी की हालत ये है कि दूधमुंही बच्ची से लेकर बूढ़ी महिला तक हवस का शिकार है, हर मिनट बलात्कार की शिकार है।
हम विश्व गुरु बनने का शेखचिल्ली ख़्वाब देखकर ज़िंदा हैं।
फांसी दो, संगसार करो, शरिया क़ानून, चौराहे पर लटका दो आदि आदिम सजाएं प्रत्येक की ज़ुबान पर हैं, और करोड़ों पोटेंट बलात्कारी समाज मे घूम रहे हैं।
कितनो को फांसी पर लटकाओगे ?
सवाल हमारी सामाजिक परवरिश और परिवेश का है, हमारा समाज निम्न दर्जे का यौन कुंठित समाज है, और परले दर्जे का लालची और मौकापरस्त।
हमें बड़ी सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता है और साथ ही राजनीतिक चेतना की भी।
अन्यथा हम प्रदूषण, सामाजिक भेदभाव, जाति, मजहब और आर्थिक असंतुलन के चलते एक बेहद डरावने और आदिम देश बनकर रह जाएंगे।
याद कीजिये, ये देश बुध्द, कबीर, बाबा शेख़ फरीद, नानक, मीरा, रैदास जैसे फकीरों की बेहतर समझ वाला भी है और भगत सिंह जैसी क्रांतिकारी राजनीतिक समझ का भी।
इसी देश मे मुंशी प्रेमचंद जैसे कथाकार भी हुए, अमृता प्रीतम, शिव बटालवी, कैफ़ी आज़मी, फिराक, जिगर, अकबर इलाहाबादी, दुष्यंत, नागार्जुन, मैथिली शरण गुप्त, सर्वेश्वर सक्सेना जैसे कालजयी कवि और शायर पैदा हुए।
बलराज साहनी, बी आर चोपड़ा, राजकपूर, उत्पल दत्त, गुरुदत्त, शबाना, महबूब, रफी, हसरत जयपुरी, शकील बदायुनी, मजरूह, नरगिस, श्याम बेनेगल जैसे सैकड़ों फिल्मकार, गीतकार, गायक, अभिनेता जिन्होंने अपनी फिल्म के माध्यम से समाज को एक से एक बेहतर शाहकार दिए हैं और समाज को रोशनी दी।
हमारे पास एक बेहतर विरासत है, जिसकी सरपरस्ती में हम एक उम्दा और शालीन, भयमुक्त समाज का निर्माण कर सकते हैं, किन्तु देखता हूँ, कि बलात्कार, गोरक्षा, प्रदूषण, मॉब लींचिंग, मंदिर, मस्जिद झगड़े अपार रूप धारण कर चुके और सरकारें, शिक्षा और चिकित्सा का निजीकरण, बेरोजगारों की बढ़ती कतार, महंगाई, साफ पानी, आवास, आदि पर कतई गंभीर नहीं हैं, उन्हें पता है, कि असल मुद्दे पर जनता एकत्र होगी ही नहीं।
अतः समझदार बनिये और असल लड़ाई को कमर कस लीजिए 
दोस्तों हमारे समय का इतिहास यहीं न रह जाए, कि हम धीरे-धीरे मरने को ही जीना समझ बैठें।
हमारा समय घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि हड्डियों के गलने खपने से नापा जाए।
"पाश"
(साभार फेस बुक)