क्या निषाद वंशज होने की वजह से उधम सिंह कश्यप को नहीं मिला ‘शहीद-ए-आजम’ का दर्जा ??

अलीगढ़, उत्तर प्रदेश (Aligarh, Uttar Pradesh), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) रिपोर्टर राहुल कश्यप द्वारा निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार निषाद की विशेष रिपोर्ट, 31 जुलाई 2018।
       क्या निषाद वंशज होने की वजह से उधम सिंह कश्यप को नहीं मिला ‘शहीद-ए-आजम’ का दर्जा ??
      आज शहीद उधम सिंह की 68वीं पुण्यतिथि पर 31 जुलाई को देशभर में उन्हें याद किया गया। अत्याचारी अंग्रेज जनरल ओ. डायर को उसके देश में जाकर मारने वाले ऊधम सिंह को सिर्फ किताबों में ही जाना जाता है। इतिहास में उन्हें वो जगह नहीं मिल पाई जिसके वे असली हकदार थे। दुश्मन को उसके घर में मारना, वो भी विदेश में जाकर अपने आप में एक महान और साहसिक कारनामा था, लेकिन जाति उनके गुणगान में बाधा बन गई।
       पुराने समय से ही जातिवाद से ग्रसित समाज ने उन्हें इतिहास में भी सीमित कर दिया। निश्चित तौर पर यह सब उनकी जाति के कारण ही हुआ। दरअसल वे उस जाति और समाज का हिस्सा नहीं थे, जिनके हाथों में कलम रही है। कलम वालों का इतिहास रहा है, कि वे एक तरफा महिमा मंडन करते रहे हैं। तमाम तरह के आडंबरों और झूठों का महिमा मंडन करने वाली कलम को असली नायकों के बारे में लिखने में शायद लकवा मार गया। ऊधम सिंह भी अगर डायर को मारने इंग्लैंड नहीं गए होते तो पूरी संभावना थी कि जितना आपको उनके बारे में जानकारी है वो भी नहीं नसीब हो पाती।
        क्रान्तिकारी उधम सिंह का जन्म पंजाब के संगरुर जिले के सुनाम गांव में 26 दिसंबर 1899 को हुआ था। उनके पिता चुहड राम व माता का नाम नारायणा देवी पंजाब से मजदूरी करने यूपी के कानपुर में आ गए थे। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी और रोल्ट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों ने एक सभा रखी थी, जिसमें सभी धर्मों के लोग मौजूद थे। उधम सिंह यहां सबको पानी पिलाने का काम कर रहे थे।
         इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालिन गवर्नर माइकल ओ. डायर ने ब्रिगेडियर जनरल एडवर्ड हैरी डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को गोलियों से भून दे। जनरल डायर ने अपने 90 सैनिकों को लेकर जलियावाला बाग को चारों तरफ से घेर लिया और निहत्थे लोगों पर गोलियां चलवा दीं, जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए। मरने वालों में औरतें, बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी थे। गोलियों के खौफ से कई लोग पार्क में मौजूद कुंए में कूद गए, जिसमें डूबने से उनकी मौत हो गई। 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही निकाले गए थे।
         इस घटना के बाद उधमसिंह ने प्रतिज्ञा ली कि वे डायर को मारे बिना चैन की सांस नहीं लेंगे। तब उन्होंने जलियावाला बाग काण्ड के जिम्मेदार जनरल डायर को इग्लैण्ड में जाकर गोली मारी। इसमें डायर और उनके दो अंगरंक्षकों की मृत्यु हुई थी। इसके बाद उधम सिंह ने अपनी तरफ से कोई सफाई देने के बजाय जान देना स्वीकार किया। 31 जुलाई 1940 को वीर उधम सिंह को ‘पेंटनवीले जेल’ में फांसी दे दी गई। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए।
        उधम सिंह के गांव में उनके नाम से स्मारक बना है लेकिन उनका घर उपेक्षाओं की मार झेल रहा है। गांव के कुछ लोगों ने उधम सिंह की विरासत (उनके घर) को बचाने का जिम्मा लिया हुआ है। सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए मूर्तियों और स्मारकों पर भले ही अरबों रुपये बहाती रही हैं लेकिन निषाद वंशीय महापुरुषों के नाम पर चुप्पी साध जाती हैं।