ऐसा हो रहा है नेशनल हाईवे का विकास की भैंस ही चली गई उसके गड्ढे में

सिद्धार्थनगर जनपद के संविदा कर्मचारी नीति आयोग की मंशा को विफल होता देख रहे है। पिछड़े ज़िलो में रेखांकित सिद्धार्थनगर में नीति आयोग की मंशा अधिकारियों के उपेक्षा के कारण विफल होती प्रतीत हो रही है। ज़िले की सम्पूर्ण सड़के तालाब का रूप ले चुकी है। यहाँ तक की NH-233 जो मण्डल मुख्यालय से होते हुए नेपाल को जोड़ता है, पर अभी जून माह में दस करोड रुपये खर्च करके लेपन कार्य करके दिखाया गया था। लेकिन जुलाई बीतते-बीतते पूरी सड़क ज़िले की सीमा तक गड्ढ़ों में तब्दील हो गई जिस पर आए दिन इनमें बस, ट्रक, बोलेरो फंसा होने का समाचार छपता रहता है और आवागमन वाधित रहता है। इससे मालूम होता है कि लेपन कार्य में कार्यदायी संस्था एवं अधिकारियों की मिली भगत से धन हड़प लिया गया और घटिया सामग्री का प्रयोग करके लेपन का कार्य पूर्ण दिखा दिया गया। सरकार को चाहिए कि कार्यदायी संस्था को वाध्य करे कि वह सड़क की दुर्दशा पर ध्यान देते हुए उसको आवागमन हेतु सुलभ बनाने का कष्ट करे।
     इसी परिपेक्ष में ग्रामीण शौचाल व ग्रामीण आवास व्यवस्था भी राजनेताओं और अधिकारियों, कर्मचारियों के कमीशन की भेट चढ़ गई है क्योंकि नीति आयोग की मंशा के अनुसार चाहे रोजगार हो, शौचालय निर्माण हो, आवास निर्माण हो, स्वास्थ एवं चिकित्सा हो, शिक्षा हो, राजस्व हो अथवा ग्रामीण सड़कों की मरम्मत का कार्य हो इन तमाम सभी बिन्दुओं पर सरकार की मंशा विफल होती दिख रही है। क्योंकि कोई भी कार्य सिस्टमेटिक ढंग से और पूर्ण ईमानदारी के साथ निष्पादित नही हो रहा है जिसका मुख्य कारण कमीशन खोरी और भ्रष्टाचार है। जैसा कि अभी हाल ही में आए नीति आयोग की जाँच टीम ने अपनी रिपोर्ट में भी दर्शाया है कि इस ज़िले में शौचालय निर्माण में दो हज़ार, आवास निर्माण में पचीस हज़ार और सड़क निर्माण में पचीस प्रतिशत तक कमीशन चला है। जो कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों एवं राजनेता डकार रहे है। जिससे कार्यदायी संस्थाएं मानक के अनुरूप काम करने में विफल हैं।
           सरकार की मंशा सबके लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य मुहैया कराना है एवं "सबका साथ सबका विकास", करना है, सोच तो बहुत ही अच्छी है किन्तु कार्य रूप में परिणत होने में तमाम वाधाएं है। जैसा कि अभी हाल ही में शिक्षा विभाग में देखने को मिला है। पढ़े-लिखे युवक ज़िले से बाहर जाकर मजदूरी करने को विवष हैं, जबकि अधिकारी और कर्मचारियों की मिली भगत से दूसरे ज़िलों से फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर यहाँ नौकरी कर रहे हैं। जैसा कि सिद्धार्थनगर और गोरखपुर में शिक्षकों के वर्खास्तगी की कार्यवाही की गई है जो अपर्याप्त है। अभी तमाम ऐसे फर्जी शिक्षक जो अधिकारी और कर्मचारियों तक अपनी पहुँच बना लिए है वे वेझिझक काम कर रहे हैं। वहीँ ज़िले के पढ़े-लिखे युवक संविदा या दैनिक कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं या वेरोजगार होकर रोजगार के चक्कर में घूम रहे हैं। मेरा सुझाव है कि शिक्षक भर्ती में दूसरे ज़िलों के लोगो को दूसरे ज़िलों में नियुक्ति न दी जाये जिससे फर्जी नियुक्तियां बंद होंगी। साथ ही साथ राजकीय विभागों में ट्रांसफर आर्डर पर तब तक जोइनिंग न कराया जाय जब तक उस आदेश का सत्यापन संवन्धित विभाग से न हो जाय। शिक्षा विभाग में शिक्षकों की संख्या अधिक होने से फर्जीवाडे का खेल अधिक सुनाई दे रहा है जबकि ऐसे ही फर्जी कर्मचारी कृषि विभाग, स्वास्थ्य विभाग, राजस्व विभाग, पी डब्ल्यू डी विभाग, सिंचाई आदि सभी विभागों में फर्जी सर्टिफिकेट और ट्रान्सफर ऑर्डर के द्वारा लोग नौकरी कर रहे हैं, जिनका भी सत्यापन होना न्याय संगत होगा। क्योंकि अनैतिक लोग मलाई काट रहे है और नियम, कायदे, कानून का पालन करने वाला सरकारी उपेक्षाओं का शिकार हो कर परेशान हो रहा है।