ये मछुआरों की बस्ती है…

ये मछुआरों की बस्ती है…
बोतल महँगी है तो क्या हुआ,
थैली खूब सस्ती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

1:  ब्रह्मा, विष्णु इनके घर में,
कदम, कदम पर जय श्रीराम।
रात जगाते शेरोंवाली की……
करते कथा सत्यनाराण..।।
पुरखों को जिसने मारा
उसकी ही कैसिट बजती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

2:  तू तुरैहा और मैं मझवार हूँ,
ये कहार और वो धीवर।
एक तो हम कभी बन ना पाये,
बन गई जगह जगह टोली।।
अपना मुक्तिदाता को भूले,
गैरों की झांकी सजती है।
ये मछुआरोंकी बस्ती है ।।

3:  हर महीने वृंदावन दौड़े,
माता वैष्णो छ: छ: बार।
गुडगाँवा की जात लगाता, सोमनाथ को अब तैयार।।
बेटी इसकी चार साल से,
दसवीं में ही पढ़ती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

4: बेटा बजरंगी दल में है,
बाप बना भगवा धारी
भैया हिन्दू परिषद में है,
बीजेपी में महतारी।

मंदिर मस्जिद में गोली,
इनके कंधे चलती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

5: शुक्रवार को चौंसर बढ़ती,
सोमवार को मुख लहरी।
विलियम पीती मंगलवार को,
शनिवार को नित जह़री।।
नौ दुर्गे में इसी बस्ती में,
घर घर ढोलक बजती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

6:  नकली बौद्धों की भी सुन लो,
कथनी करनी में अंतर।
बात करें बौद्ध धम्म की,
घर में पढ़ें वेद मंतर।।
बाबा साहेब की तस्वीर लगाते,
इनकी मैया मरती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

7: औरों के त्यौहार मनाकर,
व्यर्थ खुशी मनाते हैं।
हत्यारों को ईश मानकर,
गीत उन्हीं के गाते है।।
चौदह अप्रैल को बाबा साहेब की जयंती,
याद ना इनको रहती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

8:  डोरीलाल इसी बस्ती का,
कोटे से अफसर बन बैठा।
उसको इनकी क्या पड़ी अब,
वह दूजों में जा बैठा।।
बेटा पढ़ लिखकर शर्माजी,
बेटी बनी अवस्थी है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

9:  भूल गए अपने पुरखों को,
महामही इन्हें याद नहीं।
अम्बेडकर, बिरसा, बुद्ध,
वीर जुब्बा साहनी की याद नहीं
फूलनदेवी को ये क्या जानें,
इनकी वह क्या लगती है।
ये मछुआरों की बस्ती है ।

मैं भी लिखना सीख गया हूँ,
गीत कहानी और कविता।
इनके दु:ख दर्द की बातें,
मैं भी भला कहाँ लिखता था।।
कैसे समझाऊँ अपने लोगों को मैं,
चिंता यही खटकती है।
ये मछुआरों की बस्ती है।।
(रचियता कुलदीप तुरैहा एडवोकेट, मुरादाबाद)