युगों युगों से गूंगे थे हम, अब हमने ललकारा है

फतेहपुर, उत्तर प्रदेश (Fatehpur, Uttar Pradesh), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) रिपोर्टर राम आसरे निषाद की रिपोर्ट, 7 सितम्बर 2018।
युगों युगों से गूंगे थे हम, अब हमने ललकारा है।
दूर हटो ए बाहर वालों, भारत देश हमारा है।
सदियों से हम पिटते आए, अब हमने जूता मारा है।
एक मार तुम झेल सके ना, दिन में दिखता तारा है?
सदियों से छल करते आए, छल से बहुजन मारा है
अपने आप को वीर बताते, तुम तो सबसे हारा है।
घोड़ी पर चढ़ने ना देते, तुमने हमें उतारा है।
ऊंच नीच और जात पात के, नाम पे हमको मारा है।
जिसने भी आवाज उठाई, उसको जेल में डाला है।
रावण,बाली,कर्ण,बलि को, तुमने छल से मारा है।
तुमने मुगलों के हरमों में, रहकर रात बिताई है।
सत्ता के लालच में तुमने, मुगलों को बहन वेटियाँ ब्याही है।
देश लूट के मुगलों के संग में, खूब मलाई खाई है।
तब जाकर तुम परजीवी की, तौंद निकल कर आई है।
विभीषणों के भेष में तुमने, लंका खूब जलाई है।
भारत देश पर हमला करने, फौजें खूब बुलाई हैं।
पहले अर्जुन छल से जीता, आज भी छल से जीत रहा।
द्रोणाचार्य किसी भी युग में, ना बहुजन का मीत रहा।
दिन भर धूप में मेहनत करते, तब घर चूल्हे जलते हैं।
तुम जैसे परजीव ना हम, जो भिक्षा पे पलते हैं।
देश लूटने वाले देखो, देश को कैसे चला रहे ?
दंगे कर के हर कोने में, चप्पा चप्पा जला रहे।
हिंदू मुस्लिम दो कौमों को, एक दूजे से लडा रहे।
न्यायालय की हर कुर्सी पर, कुंडली मारके बैठ गए।
आरक्षण का टुकड़ा देकर, पूरी दौलत ऐंठ गए।
आरक्षण हमने नहीं मांगा, आरक्षण तो दिया गया।
अंदर गहरा जख्म हरा है, बाहर बाहर सिया गया।
संविधान की कद्र करें हम, सही रास्ते चलते हैं।
गाड़ी घोड़ा हम ले लें तो, परजीवी क्यों जलते हैं ?
बर्मा से अफगान पाक तक, तुमने भारत तोड दिया।
सीधे-साधे इस भारत को,कई हिस्सों में मोड़ दिया।
बंद हमारा शौक नहीं था, बंद तो एक मजबूरी थी।
पद्मावती पे देश जलाया, तब कैसी मजबूरी थी ?
आम खीर से पैदा न हम, असली की औलाद है
भीम दिवाने हम भारत में, फूल नहीं फौलाद हैं।
हमें मिटाने वाले दुश्मन, तुझको अब ना छोड़ेंगे।
हड्डी हड्डी भूसा ना हो, तब तक तुझको छोड़ेंगे।
दंगों में सबसे पहले भारत तुमने जलवाया है।
कार बसें घर लोग जलाकर नया रिवाज चलाया है।
70 साल से सत्ता में हो हरदम आगे चलते हो।
हर विभाग में तुम आगे हो फिर भी हम पर जलते हो ?
मनरेगा में काम करो और फसल काट के दिखलाओ।
हम लेते हैं तुमरा हिस्सा आरक्षण  तुम ले जाओ।
तुम जैसे डरपोक कामचोरों से देश गुलाम रहा।
सोने की चिड़िया था भारत अब पीतल के दाम रहा।
(आर०वी०सिंह माथुर एड़वोकेट की कविता साभार प्रकशित)

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