मुंबई गुजरात में मार खाने जाने से बचने का उत्तर भारतीयों के लिए सबसे बड़ा मंत्र

अलीगढ़, उत्तर प्रदेश (Aligarh, Uttar Pradesh), एकलव्य मानव सन्देश (Eklavya Manav Sandesh) ब्यूरो रिपोर्ट, 11 अक्टूबर 2018। मुंबई गुजरात में मार खाने जाने से बचने का उत्तर भारतीयों के लिए सबसे बड़ा मंत्र।

जिस दिन यूपी, बिहार वाले मंदिर की जगह फैक्टरियां लगाने के लिये वोट करने लगेंगे, उस दिन मार खाने गुजरात या मुम्बई नहीं जाना पड़ेगा।
राजनीती में हिस्सेदारी ही आपको सब कुछ दिला सकती है। राजनीती ही है जिसके कारण देश के कुछ भागों का ज्यादा विकास हुआ है और कुछ आज भी 70 साल पहले जैसी जिंदगी जीने को मजबूर बने हुए हैं।
जो व्यक्ति व संस्थान किसी मिशन पर कार्य करता है, उसे हार का किंचित भय नही होता। जो हार के भय पर विजय प्राप्त कर लिया उसे कोई जीतने से भी नहीं रोक सकता।
देश की जनता ने भाजपा आरएसएस की गन्दी नीतियों को नही समझा तो देश फिर से गुलाम हो जाएगा। इसी तरह से क्षेत्रवाद हो जाएगा तो भारतीय किसे कहा जायेगा.. अफ़सोस
उत्तरप्रदेश और बिहार ने तुम्हें पूरे “देश” का मालिक बना दिया। और तुम हमें “गुजरात” से भगाओगे तो हम तुम्हें देश से भगाने का काम करेंगे
 अगर एक अपराधी की बजह से सारे यू.पी., एम.पी., बिहारी लोग अपराधी हैं, तो क्या कुछ चोरों की बजह से यह मान लिया जाय कि सारे गुजराती चोर हैं।
आज के इस दौर में मछुआ समाज जैसा जीवन यापन कर रहा है, उससे कई गुना कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन करता था दलित, यादव व ब्राह्मण समाज।
      इतिहास कहता है दलित भाईयों के पास भोजन नहीं था। भोजन करने के लिए, यादव भाईयों के पास दुध में पानी मिलाने के अलावा कोई काम नही था। भीख माँगने वाले भिखारियों के पास भीख माँगने के अलावा कोई काम नहीं था। परन्तु आज इन समाजों की अपनी-अपनी पार्टी की देन है कि इन समाजों का जीवन यापन, रहन-सहन व भविष्य बदल गया है।
    धन्यवाद है उस समाज का जिन्होंने अपने कमांडर (बहन जी, मा. मुलायम सिंह जी) की बात मान कर अपने भविष्य का महल खड़ा किया, तो आज वह् समाज माला-माल है।
आज मछुआ समाज भी अपने कमांडर महामना मा. डा. संजय निषाद जी को मान कर भविष्य का महल खड़ा कर रहा है।
आज निषाद पार्टी मछुआ समुदाय की एक पहचान है, जो बड़े ही गर्व की बात है। आज देश के राजनैतिक पटल पर मछुआ समुदाय का वो सम्मान है जिसकी कभी दुसरे समाज के लोगों ने कभी कल्पना नही की थी।
     डर से गुजरात से पलायन कर रहे मजदूरों, कारीगरों, ठेले, खोमचे, फल सब्जी, पकौड़ा छाप छोटे दुकानदारों के लिए अपने प्रदेश में अवसर उत्तपन्न करना ही किसी प्रदेश की सरकार के लिए आत्मसम्मान की बात होगी। ये कामगार शहरों से नहीं गांव देहात के लोग हैं। इन्हें गांव में ही डेयरी, पशुपालन, कृषि, मनरेगा जैसी सुविधाएं देनी चाहिए।
     इन ग्रामीण अंचल के कामगारों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए बिना ब्याज के बैकों से ऋण उपलब्ध कराने की जरूरत है। यू. पी. और बिहार के गांवों में रोजगार पैदा करने की जरूरत है। क्या इन दोनों सरकारों के पास इस तरह की इच्छा शक्ति है।अगर है तो स्वागत है। अगर नहीं है तो यह आत्महीनता की पराकाष्ठा है।
सबको रोटी सबको काम,
           और काम का लेंगे पूरा दाम।
शिक्षा-चिकित्सा लेंगे एक समान,
           नहीं तो करेंगे नीद हराम।
       जय निषाद राज