नरेंद्र मोदी को संस्थाओं को नष्ट करने के लिये याद किया जाएगा

अलीगढ़, उत्तर प्रदेश (Aligarh, Uttar Pradesh), एकलव्य मानव सन्देश (Eklavya Manav Sandesh) ब्यूरो रिपोर्ट, 30 अक्टूबर 2018। इंदिरा गांधी ऐसी पहली प्रधानमंत्री थी जिन पर महत्वपूर्ण संस्थाओं की गरिमा पर प्रहार करने के गंभीर आरोप लगे। यद्यपि नेहरू उनसे अधिक लोकप्रिय और स्वीकार्य राजनेता थे, लेकिन 'शक्तिशाली' प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा की चर्चा अधिक होती है।
      यह 'शक्ति' उन्हें सत्ता के केंद्रीकरण से मिलती थी जो अक्सर संविधान के दायरे को भी पार कर जाती थी। उनके मंत्रिमंडल में कायदे से नंबर दो कोई नहीं होता था क्योंकि वे ऐसा होने ही नहीं देना चाहती थी। इतिहासकार इसे उनकी असुरक्षा की भावना से भी जोड़ते हैं और केंद्रीकृत सत्ता की उनकी प्रवृत्ति से भी जोड़ते हैं।
      इंदिरा गांधी ने उन संस्थाओं की स्वायत्तता का बहुत सम्मान नहीं किया जो लोकतांत्रिक संरचना को स्थायित्व और गतिशीलता देने के लिये स्थापित की गई थीं और जिनका सम्मान उनके पिता जवाहरलाल नेहरू भी किया करते थे।
        यह 70 के दशक का मध्य था जब राजनीतिक चारणों के "इंदिरा इज इंडिया' के समूहगान ने मैडम की मति हर ली और अपने को देश के लिये अपरिहार्य मानते हुए उन्होंने इमरजेंसी की घोषणा कर दी।
    इसके बाद के घटनाक्रमों को इतिहास में अलग-अलग नजरिये से परिभाषित किया जाता रहा, लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है कि जनता ने अपनी लोकप्रिय नेता और शक्तिशाली प्रधानमंत्री को उनके अलोकतांत्रिक रवैये के लिये नहीं बख्शा। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत हुई और सत्ता से बाहर हो इंदिरा गांधी आत्म निरीक्षण की मुद्रा में आने को विवश हुई।
     संस्थाओं पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आघात का ख़ामियाजा इंदिरा गांधी को तो भुगतना पड़ा, लेकिन नरेंद्र मोदी के साथ क्या होगा?
     इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ऐसे दूसरे प्रधानमंत्री हैं जिनके शासन काल में संस्थाएं दबाव में हैं, बल्कि अत्यधिक दबाव में हैं।
      राजस्थान के एक जिला न्यायालय पर लफंगों की आक्रामक टोली द्वारा भगवा झंडा फहराने का मामला हो या विभिन्न केंद्रीय विश्वविद्यालयों के भगवा प्रयोग भूमि बनते जाने का मामला हो, यह शासन-सत्ता के सही तरीके से काम नहीं करने का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
     सीबीआई की फ़ज़ीहत इतिहास में इससे अधिक कभी नहीं हुई और यह सीधा-सीधा राजनीतिक हस्तक्षेप का परिणाम है। किसी भी प्रधानमंत्री के राज में सीबीआई सत्ता का उपकरण ही बनी रही है, लेकिन जो दृश्य अब सामने है, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
      इस केंद्रीय जांच एजेंसी के प्रति बची-खुची आस्था भी दांव पर है और दिलचस्प यह कि इस संवेदनशील मामले पर वित्त मंत्री सरकार की ओर से बयान दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि इस मामले में आंतरिक स्तरों पर सरकार में भी सब कुछ ठीक नहीं है और नरेंद्र मोदी की प्रशासनिक पकड़ संदेह के घेरे में आती जा रही है।
      फेहरिस्त लंबी होती जाएगी अगर मोदी सरकार द्वारा संस्थाओं की गरिमा पर किये गए प्रहारों की बात करें।
राफेल विवाद पर वायुसेना प्रमुख का बयान हतप्रभ कर देने वाला था और ऐसा पहली बार हुआ कि कोई सेना प्रमुख किसी राजनीतिक विवाद में सत्ताधारी दल को राहत पहुंचाने वाला कोई बयान दे। यह अनावश्यक था और वायुसेना प्रमुख की गरिमा के खिलाफ भी।
       सेना, सरकार और सत्तासीन राजनीतिक दल को एक ही भावधारा से जोड़ने की जो कोशिशें मोदी राज में शुरू से ही होती रहीं, ऐसा उदाहरण न इंदिरा गांधी के राज में दिखा था न अटल राज में नजर आया था। यह अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति है जिसने सेना की गरिमा पर आघात किया।
     अभी कल परसों रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर ने खुला आरोप लगाया कि सरकार रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का हनन कर रही है। ऐसे दौर में, जब बैंकों का एनपीए देश की अर्थव्यवस्था को खतरनाक मुहाने पर ले आया हो, अपनी स्वायत्तता पर हो रहे आघात के प्रति रिजर्व बैंक का प्रतिरोध बहुत कुछ कह जाता है। रघुराम राजन के बाद रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल के भी सरकार से मतभेद सतह पर आते जा रहे हैं और यह अर्थ व्यवस्था के लिये सुखद संकेत नहीं है। कयास लगाए जा रहे हैं कि उर्जित पटेल अपना निर्धारित कार्यकाल शायद ही पूरा करें।
     जवाहर लाल नेहरू को संस्थाओं के निर्माण के लिये याद किया जाएगा, इंदिरा गांधी को संस्थाओं के दमन के लिये याद किया जाएगा जबकि नरेंद्र मोदी को संस्थाओं को नष्ट करने के लिये याद किया जाएगा।
       योजना आयोग की जगह नीति आयोग का गठन नीतिगत परिवर्त्तन हो सकता है लेकिन नीति आयोग कहीं से वैसी भूमिका निभाता नहीं लग रहा जिसकी उम्मीदें की गई थी। यह सरकार की निजीकरण की नीति को अमली जामा पहनाने के लिये तर्क ढूंढने वाले अर्थशास्त्रियों का जमावड़ा बन कर रह गया है।
       विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को विघटित कर ऐसी संस्था बनाने का प्रस्ताव सामने है जो सरकारी मंत्रालय के प्रति अधिक जवाबदेह होगी। यह उच्च शिक्षा संरचना की स्वायत्तता पर सीधा आघात है और विशेषज्ञ इसके खतरों के प्रति निरंतर आगाह कर रहे हैं। लेकिन, सरकार अपनी मनमानी करने पर उतारू है। शक्तिशाली सरकार का मतलब यह नहीं होता कि कल्पनाशून्य सलाहकारों, जो आम जन से अधिक कारपोरेट हितैषी हैं, की सलाह पर संस्थाओं को नष्ट किया जाए, उनकी स्वायत्तता को खत्म किया जाए।
     इतिहास में दर्ज है कि सत्ता के केंद्रीकरण और स्वेच्छाचारी कार्यकलापों के लिये इंदिरा गांधी को प्रबल जन प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन, नरेंद्र मोदी के खिलाफ ऐसा कोई सघन और संगठित प्रतिरोध नजर नहीं आ रहा।
    ऐसा क्यों है?
इसका जवाब हमें 1970 के दशक के भारत और 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध के भारत में जो अंतर है, इसमें ढूंढना होगा।
     तब देश में अपेक्षाकृत अधिक गरीबी और अशिक्षा थी, लेकिन लोगों की चेतना क्रांतिधर्मी थी। प्रतिरोध के नेतृत्व का अपना आभामंडल था। मीडिया भले ही इमरजेंसी के खौफ में रेंगने लगा था लेकिन बिका नहीं था। उपनिवेशवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी खत्म नहीं हुई थी और मध्य वर्ग उपभोक्तावाद के शिकंजे में बेबस नहीं हुआ था। जनता के बीच विभाजन की लकीरें इतनी गहरी नहीं थी। तभी तो... स्वेच्छाचारी तानाशाही की आहट मात्र से जन चेतना में जो ज्वार उभरा, उसने सत्ता की चूलें हिला दी।
    आज हालात बिल्कुल अलग हैं। बेलगाम उपभोक्तावाद ने खाते-पीते वर्ग को नैतिक स्तरों पर पतित किया है और उनसे उनकी क्रान्तिधर्मिता छीन ली है। वंचितों के संकटों और संघर्षों के प्रति मध्य वर्गीय निरपेक्षता ने सामूहिक चेतना को नष्ट किया है। सबसे दुखद यह कि अस्मिताबोध की प्रगतिशील चेतना को राजनीति ने अपने घेरे में ले लिया और अस्मिताओं के संघर्ष को नकारात्मक आयाम देकर इसे सत्ता संरचना के हाथों की कठपुतली में तब्दील कर दिया है। आज मीडिया डरा हुआ नहीं है, सिर्फ बिका हुआ भी नहीं कह सकते, बल्कि आज का मीडिया उसी सत्ता संरचना का अंग बन गया है जो शोषण और लूट की बुनियाद पर अपनी सत्ता संचालित कर रही है।
      विभाजित जनमानस प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सकता क्योंकि अब के दौर में वर्गीय स्वार्थ अधिक महत्वपूर्ण हैं।
     एक नेता, एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी आज नहीं तो कल राजनीतिक दृश्य पटल से ओझल होंगे। लेकिन, उनके दौर ने वंचितों की नेतृत्वहीनता, सुप्त क्रान्तिधर्मिता और खाए-अघाए वर्ग के वैचारिक खोखलेपन को जितना एक्सपोज किया है वह इतिहास में रेखांकित किया जाएगा।
शायद... इसी से आगे का रास्ता भी निकले।
(हेमन्त कुमार झा का लेख साभार लिया गया दिनेश कुमार सहानी की वाल से)

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