2019 में ग्राम प्रधान बनेंगे भाजपा की हार का कारण ??

अलीगढ़, उत्तर प्रदेश (Aligarh, Uttar Pradesh),
एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) ब्यूरो रिपोर्ट, 7 दिसम्बर 2018। निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद पार्टी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष महामना डॉ. संजय कुमार निषाद ने जारी अपने एक व्यान में कहा है कि, सरकार द्वारा ग्राम प्रधानों का किया जा रहा शोषण आगामी 2019 के लोक सभा चुनाव में बनेगा भाजपा के हार का कारण। ग्राम प्रधान भी सांसदों एवं विधायकों की तरह ही जनता द्वारा चुना हुआ जन प्रतिनिधि होता है। फिर भी शासन और प्रशासन द्वारा ग्राम प्रधानों को नौकर से भी बद्तर समझा जा रहा है। जबकि ग्राम प्रधान देश और समाज की रीढ़ की हड्डी है।
      एक तरफ सांसदों विधायकों द्वारा अपना अपना वेतन स्वयं बढ़ा लिया जाता है। उसका पक्ष विपक्ष कोई भी विरोध नहीं करता है। तो दूसरी तरफ ग्राम प्रधानों को 3500 रुपये मासिक मानदेय दिया जाता है। जो लगभग 116 रुपये दिन के हिसाब से पड़ता है। जबकि मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों को 175 रुपये मिलते हैं। जनता द्वारा प्रधान की कीमत मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों से भी कम है। जबकि स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों में बनने वाले शौचालयों के निर्माण हेतु 12000 रुपये शासन द्वारा मिलने की व्यवस्था है। वह भी जब शौचालयों का निर्माण पूरा हो जाएगा तब, उसके पहले सारा सामान, लेबरों की मजदूरी, ग्राम प्रधान अपनी जेब से खर्च करे। और उसके बाद ग्राम प्रधानों के खिलाफ 12 जांचें।
       मनरेगा में काम कराने के लिए ग्राम प्रधानों पर दबाव। काम न कराने पर कार्यवाही की धमकी। काम कराने के बाद लेबरों के खातों में सालों पैसा नहीं आता है। मजदूर ग्राम प्रधानों के चक्कर काटते घूमते हैं। आये दिन ग्राम प्रधानों पर नौकरों की तरह शासन प्रशासन की तरफ से दबाव बनाया जाता है। कुल मिलाकर ग्राम प्रधानों को बेईमान साबित करने की कोशिश होती रहती है। जबकि ग्राम प्रधान का पद एक सम्मानित पद है। जहाँ पिछली सरकारों में ग्राम प्रधानों को बड़ा सम्मान मिलता था। तो वहीं वर्तमान सरकार में ग्राम प्रधानों को नौकरों से भी गिरा समझना बहुत ही बड़ी भूल है। जो आने वाले समय में सत्ता पक्ष के लिए निश्चित नुकसानदेह साबित होगी।
        एक तरफ ग्राम प्रधान को देश और समाज की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। तो वहीं दूसरी तरफ उसका शोषण करना हास्यास्पद बना हुआ है। ग्राम प्रधानों के पास भी गांवों में वोट बैंक होता है। वह किसी भी चुनाव में हार को जीत में बदल सकता है इसमें जरा भी सन्देह नहीं है।