मंडल कमीशन” को कैसे “कमंडल” में बदला गया!

अलीगढ़, उत्तर प्रदेश (Aligarh, Uttar Pradesh), एकलव्य मानव संदेश (Eklavya Manav Sandesh) सोशल मीडिया ब्यूरो रिपोर्ट, 2 दिसम्बर 2018। सन-1953 में डॉ.बाबासाहब आम्बेडकर जी के दबाव में आकर नेहरू ने OBC की जनगणना के लिए काकासाहब कालेलकर (पूना का ब्राम्हण) की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया था । काकासाहब कालेलकर ने देशभर में OBC की जनगणना कर वो रिपोर्ट प्रधानमंत्री नेहरु को सौपी लेकिन नेहरु ने उस रिपोर्ट की संसद में चर्चा भी नहीं होने दी। नेहरु ने 52% OBC के सन्दर्भ में संसद में चर्चा भी नहीं होने दी तो उस पर अमल करना तो दूर की बात थी । जिस नेहरू ने संसद में OBC के आयोग पर चर्चा भी नहीं होने दी उस नेहरु को हम लोग आधुनिक भारत का निर्माता, महा-प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, बच्चो के चाचा ऐसे उपनाम देते है । संसद को हम भारत का प्रतिनिधिगृह कहते है, वहा 52% OBC के समस्याओ पर चर्चा भी नहीं होने दी गई यह इतिहास हमारे सामने है । इस प्रकार नेहरू ने काकासाहब कालेलकर आयोग को कचरे के डिब्बे में डाल दिया था ।
काकासाहब कालेलकर आयोग को कचरे के डिब्बे में डालने के बाद इंदिरा गांधी की सरकार में, इंदिरा गांधी ने सन-1977 में विरोधी पार्टियों के नेताओं को जेल में डाल दिया, लेकिन दुर्भाग्य से उसी समय चुनाव घोषित हुआ और इंदिरा गांधी को सभी नेताओं को जेल से बाहर निकालना पड़ा था । लेकिन विरोधी पार्टी के नेता जेल में जाने से बहुत नाराज थे इसीलिए उन्होंने नई पार्टी “जनता पार्टी” का गठन किया था । जनता पार्टी ने घोषणा कर दी कि “यदि हमें चुनाव में बहुमत मिलता है तो हम काका कालेलकर आयोग की सिफारिसे लागू करेंगे”. चुनाव हुआ और जनता पार्टी को बहुमत मिला और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने । प्रधानमंत्री बनाने के बाद मोरारजी देसाई को OBC नेता लोग मिलने गए तथा उन्हें याद दिलाया की आपने चुनाव के पहले काका कालेलकर आयोग की सिफारिसे लागू करने का वादा किया था। तब मोरारजी देसाई के आगे संकट खड़ा हो गया, तब उन्होंने एक चल खेली और OBC नेताओं को कहा की, “कालेलकर आयोग सन-1953 का था और अभी सन-1977 चालू है तथा अभी बहुत परिवर्तन हो चूका है, हम ऐसा करते है की नए आयोग का गठन करते है”।

मोरारजी देसाई जन्म से ब्राम्हण थे और कर्म से गांधीवादी थे, उन्होंने एक चल बनाई की, “नए आयोग का गठन करने के बाद और रिपोर्ट आते आते 2-4 साल निकल जायेंगे और अपने सरकार भी तब तक निकल जायेगी” और ठीक वैसा ही हुआ मोराराजी देसाईं की सरकार 18 महीनो में ही गिर गई और इंदिरा गांधी फिर से देश की प्रधानमंत्री बनी ।

मोराराजी देसाई ने मंडल आयोग का गठन किया था । मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सन-1981 में इंदिरा गांधी को सौप दी। मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा की “OBC समाज 3743 जातियों में विभक्त है और SC/STको जैसे आरक्षण मिलता है वैसा ही OBC को भी मिलना चाहिए तथा उन्हें पदोन्नति में भी आरक्षण मिलना चाहिए” ऐसा प्रस्ताव इंदिरा गांधी के सामने रखा लेकिन इंदिरा गांधी ने जैसे की, नेहरू ने काका कालेलकर आयोग के ऊपर संसद में चर्चा नहीं होने दी ठीक वैसे ही इंदिरा गांधी ने भी मंडल आयोग के ऊपर संसद में चर्चा नहीं होने दी थी ।

नेहरू मंत्रिमंडल में और इंदिरा मंत्रिमंडल में बहुत बड़ा अंतर था । नेहरू मंत्रिमंडल में एक भी OBC खासदार नहीं थे लेकिन इंदिरा मंत्रिमंडल में 8% OBC खासदार थे । उन्होंने संसद में हंगामा सुरु कर दिया तब SC/STके खासदार भी OBC के साथ खड़े हुए, इससे इंदिरा गांधी घबरा गई । इंदिरा गांधी को लगा की sc/st/OBC के लोग एक हो गए तो जो ये लोग हजारो सालो से ब्राम्हणों के गुलाम थे वे आजाद हो जायेंगे और ब्राम्हण अल्पमत में आ जायेंगे, ऐसा नहीं होना चाहिए इसीलिए इंदिरा गांधी ने सन-1982 में आरएसएस के साथ एक गुप्त समझौता किया और आरक्षण विरोधी आन्दोलन खड़ा किया गया । उस समय माधव सिंह सोलंकी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब sc/st/OBC के लोग एक नहीं होने चाहिए इसीलिए आन्दोलनकर्ताओ ने कांग्रेस खासदार हीरालाल परमार का घर जला दिया, उस समय बहुत दंगे हुए, ये दंगे किसलिए हुए इसकी जांच के लिए एक आयोग का गठन किया गया और वो आयोग था दवे आयोग । दवे ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था की, “कांग्रेस और बीजेपी के लोगो ने मिलकर आरक्षण विरोधी आन्दोलन चलाया था”. लेकिन दंगा करने के लिए गुजरात को ही क्यों चुना ? क्योकि उस समय गुजरात ही एकमेव राज्य था जहा sc की जनसंख्या 7% थी । जब ये आन्दोलन सुरु हुआ तब बताया गया की SC/STके लोगो को पहले से ही 15% +7.5% =22.5% आरक्षण है फिर भी ये लोग आरक्षण की मांग कर रहे है । ऐसा बताकर sc/st/OBC के लोगो में एकता नहीं होनी चाहिए इसीलिए इंदिरा गांधी ने RSS के साथ गुप्त समझौता करके इस काम को अंजाम दिया था.

दूसरा काम कांग्रेस और बीजेपी के लोगो ने किया था की, गुजरात में जो दंगे हुए उसमे ब्राम्हणों को लगा की हिन्दू समाज विभाजित हो रहा है इसलिए हिन्दू समाज को एकसाथ लाने के लिए VHP ने अशोक सिंघल के नेर्तुत्व में एक यात्रा निकाली । उस समय इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी । जब यह यात्रा दिल्ली पहुची तो इंदिरा गांधी ने ही इस यात्रा का स्वागत किया था । यह कब समझ में आया? जब दूसरी यात्रा अशोक शिंघल ने निकाली तब पि.व्ही.नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे । अशोक सिंघल ने नरसिम्हाराव को याद दिलाया की,” जब हमने पहली यात्रा निकाली थी तब उसका स्वागत तुम्हारी महान नेता इंदिरा गांधी ने ही किया था और जब तुम्हारी नेता इंदिरा गांधी एकता यात्रा का स्वागत कर सकती है तो आप क्यों नहीं ? इससे यह स्पस्ट होता है की RSS , VHP और कांग्रेस इनकी मिलीभगत थी और ये स्पष्ट होता है की इस आरक्षण विरोधी आन्दोलन में इंदिरा गांधी ने भी खलनायक की भूमिका अदा की थी, इसीलिए आरक्षण विरोधी आन्दोलन के खलनायको की लिस्ट में इंदिरा गांधी का भी नाम शामिल किया जाना चाहिए।

सन-1984 में इंदिरा गांधी के आगे लोकसभा का संकट खड़ा हो गया क्योकि संसद में 8% OBC खासदार ( सांसद) हंगामा कर रहे थे, तब मजबूर होकर इंदिरा गांधी को मंडल कमीशन की रिपोर्ट संसद में चर्चा के लिए रखनी पड़ी थी । संसद में इस रिपोर्ट पर बार-बार चर्चा हो रही थी और हंगामे हो रहे थे, इसीलिए उत्तर भारत के OBC लोगो में जागृति हो रही थी, इससे ब्राम्हणों के आगे संकट खड़ा हो गया की, लोग तो उनके खिलाफ जा रहे है। ऐसी स्थिति में 1984 का लोकसभा चुनाव कैसे जीता जाए ? यह संकट इंदिरा गांधी के सामने खड़ा हो गया । तब इंदिरा गांधी ने दोहरी रणनीति बनाई। पहली रणनीति यह की OBC लोगो की सामाजिक जागृति को धार्मिक जागृति में बदला जाए और इनके मतो का उपयोग धार्मिक जागृति द्वारा मंडल आयोग के खिलाफ चुनाव जीता जाए और इस रणनीति को लागू करने के लिए इंदिरा गांधी ने योजना बनाई ।

25 जून, 1984 को इंदिरा गांधी ने “oparetion blue star” की योजना बनाकर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर हमला कराया । स्वर्ण मंदिर पर हमला करने के लिए इंदिरा गांधी ने मिलिटरी कमांडर इन चिफ अरुणकुमार वैद्य को अमृतसर भेजा और अरुणकुमार वैद्य ने अमृतसर जाकर सैनिक कार्यवाही की थी। स्वर्ण मंदिर पर हमला करने से बहुत बड़ा फसाद निर्माण हुआ, उस समय भारतीय सेना में 17% शिख सैनिक थे वहा भी दंगल सुरु हुई । सिख लोगो की धार्मिक भावना पर बहुत बड़ा आघात पहुचाया गया था ।

इंदिरा गांधी ने सतवंत सिंह और वेअंत शिह इन sc लोगो को अपना बॉडीगार्ड नियुक्त किया था, पर जब इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर पर हमला कराया तब उस बॉडीगार्ड लोगो की धार्मिक भावना जागृत हो गई और उन्होंने इंदिरा गांधी की गोलियों से हत्या कर दी थी।

इंदिरा गांधी ने sc/st/OBC लोगो में एकता नहीं होनी चाहिए इसलिए “oparetion blue star” की योजना बनाई थी क्योकि मंडल आयोग की चर्चा संसद में बंद हो जाए । परिणामत: इंदिरा गांधी की हत्या आरक्षण का विरोध करने से हुई और स्वर्ण मंदिर पर जो हमला किया गया था वो केवल और केवल मंडल आयोग की दिशा बदलने के लिए था ।

इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने और उसने भी वही रणनीति बनाई । परिणामत: चुनाव में “हिन्दुस्थान बनाम खालिस्थान” का नारा दिया गया था । OBC लोगो ने सोचा की यदि हिन्दुस्थान रहेगा तो मंडल आयोग रहेगा । इसीलिए हिन्दुस्थान को बचाने के लिए OBC लोगो ने बड़े पैमाने में कांग्रेस को वोट दिया और खास बात उस चुनाव में RSS के लोग भी कांग्रेस को समर्थन कर रहे थे । इस चुनाव में कांगेस के 413 खासदार चुनकर आने के बाद भी राजीव गांधी को चिंता हो रही थी की, यहाँ से एक भी खासदार पार्टी छोड़कर नहीं जाना चाहिए । इसीलिए राजिव गांधी ने “एंट्री डीफ़ेक्शन बिल” संसद में पास किया । चुनाव के बाद मंडल कमीशन का मुद्दा फिर से जोर पकड़ने लगा था, तब OBC लोगो का मंडल कमिशन से फिर से ध्यान भटकाने के लिए राजीव गांधी ने श्रीलंका में “शांति सेना” भेजी । लेकिन आरक्षण विरोधी आन्दोलन के बाद राजीव गाँधी की भी हत्या कर दी गई ।

राजीव गांधी के बाद वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने । महत्वपूर्ण बात यह थी की व्ही.पी.शिह बीजेपी और कमुनिस्ट के सहयोग से प्रधानमंत्री बने थे । मतलब वीपी सिंह सरकार दो नाव पर सवारी कर रही थी । एक नाव बीजेपी की और दूसरी नाव कमुनिस्ट लोगो की । जैसे ही मंडल कमीशन लागू हुआ, बीजेपी के लोग नाराज हो गए । लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली । लालू प्रसाद यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे । जब रथयात्रा बिहार पहुची तब लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को गिरफ्तार कराया । आडवानी को गिरफ्तार कराया इसलिए अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली में व्ही.पी.शिह को दिया हुआ सपोर्ट निकाल लिया और वीपी सिंह की सरकार गिर गई । जब मंडल आयोग लागू हुआ तब मंडल आयोग को समाप्त करने के लिए 31 संविधान विशेषज्ञ सर्वोच्च न्यायालय में खड़े हुए, तब वीपी सिंह ने एक चालाकी की, वह यह की उन्होंने मंडल कमीशन के अंतर्गत नौकरी में आरक्षण दिया लेकिन शिक्षा में आरक्षण देने से मना कर दिया और जब शिक्षा में ही आरक्षण नहीं होगा तब नौकरियों में आरक्षण देने का क्या फायदा था । वीपी सिंह ने 52% OBC समाज को केवल 27% आरक्षण लागू किया,

मनुवादी लोग SC/ST को 22.5% आरक्षण मिलने से वैसे ही परेशान थे, उसमे भी मंडल आयोग द्वारा OBC को 27% आरक्षण मिला तो और ज्यादा परेशान हो गए । मनुवादियो ने सोचा की यदि “ऐसे ही आरक्षण बढ़ता गया तो शाषण, प्रशाषण और न्यायालयों में हमारी जो व्यवस्था है, वो खतरे में आ जायेगी ? उससे हमारे लोगो का IAS, IPS होना मुश्किल हो जाएगा और जब हमारे लोग बड़ी मात्रा में IAS, IPS नहीं बनेंगे तब हजारो सालो से हमारी बनी हुई हुकूमत कम हो जायेगी और प्रशाषण पर SC/STके खिलाफ जो हम निर्णय देते थे और निर्णय लेते थे वो मुश्किल हो जाएगा”. जब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने देखा की, मंडल आयोग के सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट में केस चालू है । इस केस का निर्णय आयेगा या नहीं इसकी राह देखने से हमारी परेशानी कम होनेवाली नहीं है, तब उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही सन-1989 में New Economic Policy का कार्यक्रम सुरु किया ।

महत्वपूर्ण बात यह थी की जो 31 संविधान विशेषज्ञ मंडल आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे थे तब मंडल कमीशन के लिए लड़ने के लिए एक भी संविधान विषेशज्ञ तैयार नहीं था, बाद में लालू प्रसाद यादव ने मंडल आयोग के तरफ से लड़ने के लिए राम जेठमलानी जो की क्रिमिनल वकील था, सिविल वकील नहीं था के बावजूद भी मंडल कमीशन के लिए लड़ने के लिए तैयार किया था । उसके बाद 16 नवम्बर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने मंडल आयोग के सन्दर्भ में अपना फैसला सुनाया की मंडल कमीशन में क्रीमीलेयर लागू किया जाएगा । क्रीमीलेयर का मतलब हमारे बहुत से लोगो को पता नहीं है । क्रीमीलेयर का मतलब यह है की, “जिसका वार्षिक आय 1 लाख रुपये (अभी 6 लाख रुपये कर दिया गया) से कम है उसे ही आरक्षण का लाभ मिलेगा । इसका दूसरा मतलब यह होता है की, ” जिसके पास पैसा होगा वो अपने बच्चो को शिक्षा देगा, जब बच्चा पढ़-लिखकर आरक्षण का फायदा लेने वाला होगा तब उसे कहा जाएगा की आपको आरक्षण नहीं मिलेगा और जो पढ़-लिख नहीं सकता तथा आरक्षण का फायदा लेनेल ायक नहीं होगा, उसे कहा जाएगा की आपको आरक्षण मिलेगा” ।

16 नवम्बर,1992 को सुप्रीम कोर्ट ने मंडल आयोग के सन्दर्भ में अपना फैसला सुनाया और उसके 20 दिन बाद 6 दिसंबर,1992 को बाबरी मस्जिद गिराई गई। बाबरी मस्जिद इसीलिए गिराई गई की क्रीमीलेयर के षड़यंत्र पर पर्दा डाला जा सके । जिन लोगो को मंडल आयोग के आन्दोलन में शामिल होना था वो लोग कमंडल के आन्दोलन में शामिल हुए । जब बाबरी मस्जिद गिरी तब देश में मंडल आयोग और क्रीमीलेयर पर चर्चा पूरी तरह बंद हो चुकी थी और केवल “बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि” इस मुद्दे पर चर्चा सुरु हो गई । मनुवादियो ने इसमें एक चालाखी और की, वो यह की उन्होंने ऐसी मस्जिद गिराई जिसमे 150 सालो से कोई भी नमाज नहीं पढ़ता था । यदि क्रीमीलेयर की चर्चा चालू रहेगी तो मंडल आयोग के खिलाफ मनुवादियो ने जो षड़यंत्र बनाए थे वो लोगो को पता चल जायेंगे, यह षड़यंत्र लोगो को पता नहीं चलना चाहिए इसके लिए मस्जिद गिराई गई यह इसके पीछे की वास्तविक सच्चाई है और इस तरह से मंडल कमीशन को कमंडल में बदला गया।
(साभार सोशल मीडिया)